पाकिस्तान में डिजिटल ईशनिंदा के नाम पर 'मौत का कारोबार', फर्जी सबूतों से लोगों को फंसाया जा रहा

पाकिस्तान: अपुष्ट डिजिटल कंटेंट के आधार पर लोगों पर ईशनिंदा के आरोप, मौत की सजा के मामले बढ़े


इस्लामाबाद, 28 जनवरी। पाकिस्तान में डिजिटल अपराधों के नाम पर ईशनिंदा (ब्लास्फेमी) के आरोपों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। मानवाधिकार संगठनों ने इसे अब एक तरह का “ईशनिंदा बिजनेस” करार दिया है, जिसमें फर्जी सबूत, डिजिटल रूप से छेड़छाड़ किए गए स्क्रीनशॉट और झूठे गवाहों के जरिए लोगों को फंसाया जा रहा है।

हाल ही में दिसंबर में लाहौर हाईकोर्ट की रावलपिंडी बेंच ने एक डिजिटल ईशनिंदा मामले में छह लोगों को बरी किया, जिन्हें पहले उम्रकैद या मौत की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों और कथित ऑनलाइन सामग्री के बीच कोई विश्वसनीय संबंध साबित नहीं कर सका। यह जानकारी सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट की रिपोर्ट में दी गई, जिसे नायला मोहम्मद और सेसिल शेन चौधरी ने तैयार किया है।

अदालत ने अपने फैसले में बढ़ते “ईशनिंदा कारोबार” पर भी चिंता जताई और कहा कि अब अपुष्ट या गढ़े हुए डिजिटल कंटेंट के जरिए लोगों को ऐसे मामलों में फंसाया जा रहा है, जिनमें मौत की सजा तक का प्रावधान है। रिपोर्ट के अनुसार, ज़्यादातर निशाना धार्मिक अल्पसंख्यकों और गरीब तबके के लोग बनते हैं, जिन पर बिचौलियों के जरिये पैसे देने का दबाव बनाया जाता है ताकि केस रफा-दफा हो सके या समझौता कराया जा सके।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की ईशनिंदा कानून व्यवस्था, खासकर पाकिस्तान पीनल कोड की धारा 295-सी, जो पैगंबर मोहम्मद के अपमान पर मौत की सजा अनिवार्य करती है, ने एक बेहद खतरनाक माहौल बना दिया है। इसमें महज आरोप लगते ही गिरफ्तारी, भीड़ की हिंसा या न्यायेतर हत्या तक हो जाती है। आंकड़ों के मुताबिक 1994 से 2024 के बीच कम से कम 104 लोगों की ईशनिंदा के आरोपों के बाद न्यायेतर हत्या हुई है।

मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन मामलों में धार्मिक संगठनों से जुड़े तत्वों के साथ-साथ कुछ मामलों में फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) के अधिकारियों की भी मिलीभगत सामने आई है। कई बार बिना फॉरेंसिक जांच के ही शिकायत दर्ज कर ली जाती है और सोशल मीडिया स्क्रीनशॉट्स को सीधे सबूत मान लिया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) जैसे कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े ऑनलाइन समूह डिजिटल ईशनिंदा मामलों को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

रिपोर्ट में इस्लामाबाद की ईसाई महिला शगुफ्ता किरन का मामला भी सामने रखा गया है। चार बच्चों की मां शगुफ्ता को 2021 में एक व्हाट्सएप संदेश अनजाने में फॉरवर्ड करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जिसमें धार्मिक कंटेंट के साथ आपत्तिजनक कंटेंट मिला हुआ था। उन पर पाकिस्तान पीनल कोड की धारा 295-सी और साइबर क्राइम कानून के तहत मामला दर्ज किया गया। तीन साल तक चले मुकदमे के बाद सितंबर 2024 में अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुना दी। फिलहाल वह अपील का इंतजार करते हुए डेथ रो पर हैं।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि इस तरह के मामले न सिर्फ राज्य संस्थाओं की कमजोरियों को उजागर करते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोप किस तरह डराने, धमकाने और उगाही का हथियार बन चुके हैं। खासकर ईसाई, अहमदिया, हिंदू, सिख और शिया मुस्लिम समुदाय के लोग इस व्यवस्था में सबसे ज़्यादा असुरक्षित हैं।
 

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