स्‍पीकर ने केरल लोक भवन पर 'परंपरा का उल्लंघन' करने का लगाया आरोप

स्‍पीकर ने केरल लोक भवन पर 'परंपरा का उल्लंघन' करने का लगाया आरोप


तिरुवनंतपुरम, 27 जनवरी। केरल विधानसभा अध्यक्ष एएन शमसीर ने मंगलवार को राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के कार्यालय द्वारा किए गए अनुचित आचरण पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।

इससे लोक भवन और निर्वाचित सरकार के बीच लंबे समय से जारी गतिरोध में टकराव पैदा हो गया।

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्हें राज्यपाल के कार्यालय से पत्र मिला, जिस पर 'अत्यधिक गोपनीय' लिखा था। इसके कारण उन्हें खुद इसकी ओपनिंग देखनी पड़ी, जो रूटीन प्रैक्टिस से अलग था।

अध्यक्ष ने कहा, "यह जानकर आश्चर्य हुआ कि लेटर का कंटेंट मेरे पास पहुंचने से पहले ही मीडिया रिपोर्टों में प्रकाशित हो चुका था।"

शमसीर के मुताबिक, पत्र में मुख्यमंत्री पी. विजयन द्वारा राज्यपाल के नीतिगत भाषण समाप्त करने और सदन छोड़ने के बाद दिए गए बयान की वीडियो फुटेज की मांग की गई थी।

उन्होंने कहा, "चिंताजनक बात यह है कि स्पीकर को उस संदेश की केवल एक 'प्रति' मिली है, जिसे पहले मीडिया के साथ साझा किया गया प्रतीत होता है। मैं इसका आरोप व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल पर नहीं, बल्कि उनके कार्यालय पर लगा रहा हूं। यह केवल एक प्रति है, इसलिए मैं इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दूंगा।"

अध्यक्ष की टिप्पणियां 20 जनवरी को विधानसभा में दिए गए राज्यपाल के नीतिगत भाषण में किए गए बदलावों को लेकर हुए विवाद के ठीक बाद आई हैं।

मुख्यमंत्री विजयन ने कैबिनेट द्वारा टेक्स्ट में डिलीट किए गए हिस्सों और बदलावों को सार्वजनिक रूप से उठाया था।

उन्होंने बताया कि केरल राज्य द्वारा प्रतिकूल केंद्र सरकार की कार्रवाइयों, लंबित राज्य विधानों और राजकोषीय संघवाद के मुद्दे के कारण उत्पन्न वित्तीय संकट से संबंधित प्रमुख अंशों को या तो हटा दिया गया है या संशोधित कर दिया गया है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल को वर्ष के पहले सत्र में सरकार का नीतिगत वक्तव्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है और स्थापित विधायी नियम मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित संबोधन को आधिकारिक मानते हैं।

स्पीकर ने मुख्यमंत्री का समर्थन करते हुए पहले फैसला सुनाया था कि कैबिनेट से मंजूर टेक्स्ट से कोई भी बदलाव विधायी परंपरा का उल्लंघन है और मूल संस्करण को सदन और मीडिया के लिए आधिकारिक दस्तावेज माना जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के नजदीक आने के साथ संस्थागत टकराव और भी बढ़ सकता है, जो औपचारिक संवैधानिक पदों और निर्वाचित सरकार के अधिकार के बीच नाजुक संतुलन को रेखांकित करता है।
 

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