स्मृति शेष : निखिल बनर्जी बनना आसान नहीं, इन्होंने सितार की सरगम में रच दिया जीवन

स्मृति शेष : निखिल बनर्जी बनना आसान नहीं, इन्होंने सितार की सरगम में रच दिया जीवन


नई दिल्ली, 26 जनवरी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में पंडित निखिल बनर्जी का नाम ऐसे सितारों में शामिल है, जिनकी धुनें सिर्फ कानों को नहीं, बल्कि दिल और आत्मा को छू जाती हैं। उनका सितार वादन ऐसा था कि सुनने वाले हर बार मंत्रमुग्ध हो जाते। पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान जैसे दिग्गजों के युग में भी निखिल ने अपनी अलग ही पहचान बनाई।

निखिल रंजन बनर्जी का जन्म 14 अक्टूबर 1931 को कोलकाता के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता जितेंद्रनाथ बनर्जी भी सितार बजाने के शौकीन थे। संगीत का पहला बीज निखिल के जीवन में घर की दीवारों के बीच ही बो दिया गया था। जैसे ही नन्हें निखिल ने नौ साल की उम्र में सितार की तारों को छुआ, उनके भीतर संगीत की तीव्रता बढ़ गई। उस उम्र में ही उनकी उंगलियों में ऐसी पकड़ थी कि जैसे हर तार उनके दिल की धड़कन से जुड़ी हो।

उनकी असली यात्रा शुरू हुई तब, जब उन्होंने मैहर घराने के महान उस्ताद अलाउद्दीन खान से तालीम लेना शुरू किया। कहा जाता है कि शुरू में बाबा, यानी उस्ताद अलाउद्दीन खान, निखिल को शिष्य बनाने को तैयार नहीं थे। लेकिन जब उन्होंने निखिल के रेडियो वादन को सुना, तो आखिरकार उन्होंने हामी भर दी।

मैहर पहुंचकर, निखिल को संगीत की असली कठोर साधना का सामना करना पड़ा। एक दिन, गुरु ने उनसे राग पूर्वी बजाने को कहा। युवा निखिल ने आत्मविश्वास के साथ बजाया, तकनीकी रूप से त्रुटिहीन। लेकिन जैसे ही उन्होंने तारों को शांत किया, उस्ताद अलाउद्दीन खान खड़े हो गए और उन्हें फटकार लगाई, "पूर्वी नहीं, मुर्गी बजाया, मुर्गी!" मतलब, तुमने राग नहीं, बल्कि बेजान धुन बजाई है।

यह फटकार किसी भी साधारण बच्चे के लिए तो करारी ठोकर जैसी होती, लेकिन निखिल बनर्जी के लिए यह उनके जीवन और संगीत की दिशा बदलने वाली सीख थी। गुरु का संदेश साफ था संगीत सिर्फ उंगलियों का खेल नहीं, यह आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसके बाद निखिल को गुरु के पास कमरे में रहकर सुबह 4 बजे से रात 11 बजे तक ट्रेनिंग करनी पड़ी।

निखिल बनर्जी के वादन की खासियत यही थी कि हर राग में एक अलग कहानी होती थी। चाहे राग मारवा की तीव्रता हो या दरबारी की शांति, उनकी उंगलियां हर तार को भावनाओं की गहराई तक ले जाती थीं। उनकी शैली में रूहानियत और ध्यान की शांति थी, जो सुनने वालों को भीतर तक छू जाती थी।

वैश्विक मंचों पर भी उनकी कला ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की गूंज फैलाई। न्यूयॉर्क से लंदन तक, उनके संगीत समारोहों में लोग समय को भूल जाते थे। 1968 में उन्हें पद्मश्री, 1974 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और मरणोपरांत 1987 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

27 जनवरी 1986 को केवल 54 वर्ष की उम्र में निखिल बनर्जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी धुनें आज भी गूंजती हैं। उनके रिकॉर्ड्स सुनें, तो ऐसा लगेगा जैसे वे अभी भी कहीं पास बैठकर सितार बजा रहे हों। उनके संगीत की गहराई, उनकी साधना और उनकी आत्मा की आवाज हमेशा भारतीय शास्त्रीय संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित रहेगी।
 

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