तंजावुर के पशु चिकित्सक पुन्नियामूर्ति ने पद्म श्री मिलने पर कहा- 25 साल की सेवा का है यह सम्मान

तंजावुर के पशु चिकित्सक पुन्नियामूर्ति को पद्म श्री मिलने पर कहा- 25 साल की सेवा का है यह सम्मान


तंजावुर, 26 जनवरी। तमिलनाडु के तंजावुर के प्रसिद्ध पशु चिकित्सक और प्रोफेसर पुन्नियामूर्ति को वर्ष 2026 के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस सम्मान को लेकर उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की सामूहिक मेहनत और विश्वास का परिणाम है, जिन्होंने वर्षों से उनके साथ काम किया और उनके प्रयासों को समर्थन दिया।

68 वर्षीय पुन्नियामूर्ति तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय और तमिलनाडु वेटरिनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे किसानों और पशुपालकों के लिए लगातार काम कर रहे हैं। वे पशुओं के इलाज में पारंपरिक जड़ी-बूटी और घरेलू उपचारों को बढ़ावा देते हैं।

उनका मानना है कि नीम की पत्तियां, हल्दी, लहसुन और एलोवेरा जैसे प्राकृतिक उपाय पशुओं के लिए सुरक्षित और बिना दुष्प्रभाव के होते हैं।

पुन्नियामूर्ति ने किसानों को पशुओं में होने वाली बीमारियों जैसे गलाघोंटू, त्वचा रोग, चेचक और अन्य संक्रमणों के इलाज के लिए सरल घरेलू तरीके सिखाए हैं। उन्होंने नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की हर्बल वेटरिनरी मेडिसिन परियोजना के तहत काम करते हुए करीब 12 लाख पशुओं से जुड़ा महत्वपूर्ण डेटा एकत्र किया। इसके अलावा उन्होंने गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के हजारों पशु चिकित्सकों को हर्बल चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। वे डेनमार्क, फ्रांस, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड में आयोजित सम्मेलनों में भाग ले चुके हैं, जहां उन्होंने पशु चिकित्सा से जुड़े अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सोशल मीडिया के माध्यम से भी वे पशुपालकों को मुफ्त सलाह देते हैं और पारंपरिक चिकित्सा के प्रति जागरूकता फैलाते हैं।

पद्म श्री मिलने पर उन्होंने खुशी जताते हुए आईएएनएस से कहा, "भारत सरकार द्वारा वर्ष 2026 के लिए यह सम्मान पाकर मैं बेहद प्रसन्न हूं। मैं प्रधानमंत्री, गृह मंत्रालय और उन सभी अधिकारियों का दिल से धन्यवाद करता हूं, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम करने वाले व्यक्ति के प्रयासों को पहचान दी। पिछले 25 वर्षों से मैं पारंपरिक सिद्ध ज्ञान का उपयोग करके पशुओं और मुर्गियों में होने वाली संक्रामक और मेटाबॉलिक बीमारियों के इलाज पर काम कर रहा हूं। यह पुरस्कार उसी निरंतर प्रयास की पहचान है।"

उन्होंने यह भी कहा कि देश में अब पारंपरिक चिकित्सा की मांग बढ़ रही है, क्योंकि रासायनिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से कई बार दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं।
 
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