'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत भारतीय रक्षा क्षेत्र लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है।
इसी कड़ी में एयरबोर्निक्स डिफेंस एंड स्पेस प्राइवेट लिमिटेड ADSL) एक ऐसा पोर्टेबल 'लोइटरिंग म्यूनिशन' तैयार कर रहा है, जो युद्ध के मैदान में भारतीय पैदल सेना (इन्फेंट्री) के लिए गेम-चेंजर साबित होगा।
आसान भाषा में समझें तो 'लोइटरिंग म्यूनिशन' एक अत्याधुनिक सुसाइड (कामिकेज़) ड्रोन होता है।
यह हवा में काफी देर तक मंडराकर अपने टारगेट की तलाश करता है और सही मौका मिलते ही उस पर मिसाइल की तरह गिरकर उसे तबाह कर देता है।
यह नया सिस्टम हमारी छोटी सैन्य टुकड़ियों (प्लाटून और कंपनी स्तर) को यह ताकत देगा कि वे बिना भारी तोपखाने या लड़ाकू विमानों की मदद के, 30 किलोमीटर दूर तक छिपे दुश्मन को खोज कर नेस्तनाबूद कर सकें।
हल्का, फुर्तीला और इस्तेमाल में बेहद आसान
मोर्चे पर हर एक सेकंड कीमती होता है, इसे ध्यान में रखते हुए ADSL ने इस सिस्टम को बेहद हल्का और आसानी से ले जाने योग्य (Portable) बनाया है।पूरा सिस्टम दो हिस्सों में बंटा है:
- लॉन्चर और ड्रोन (UAV): जिसका कुल वजन लगभग 11 किलोग्राम है।
- ऑपरेटर बैकपैक: 8 किलोग्राम का यह बैग ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (GCS), एंटीना और तारों से लैस है।
इसकी सबसे बड़ी खूबी इसका 'रैपिड रिस्पॉन्स' है—यह महज 2 मिनट में हमले के लिए तैयार हो जाता है।
ऑपरेटर की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, जवान लॉन्चर से 300 मीटर और एंटीना से 100 मीटर दूर छिपकर भी इसे उड़ा सकता है, जिससे दुश्मन की जवाबी फायरिंग का खतरा लगभग खत्म हो जाता है।
चुपके से वार: दुश्मन को भनक तक नहीं लगेगी
आसमान में उड़ते समय यह ड्रोन दुश्मन के राडार और कानों, दोनों की पहुंच से दूर रहता है।इसकी सबसे घातक खासियत इसका 'टर्मिनल अटैक फेज' (अंतिम हमले का चरण) है। टारगेट के करीब पहुंचते ही यह ड्रोन अपना इंजन बंद कर देता है और 'साइलेंट ग्लाइड' (बिना आवाज किए हवा में फिसलते हुए) मोड में आ जाता है।
जब तक दुश्मन को इस खामोश मौत की भनक लगती है, तब तक उसका खात्मा हो चुका होता है।
रफ्तार, रेंज और सुरक्षित वापसी (Fail-Safe Mechanism)
- रफ्तार और रेंज: 90 से 120 किमी/घंटे की रफ्तार से उड़ते हुए यह ड्रोन 6 से 9 मिनट के अंदर 20 किमी की दूरी तय कर लेता है।
- निगरानी का समय: टारगेट एरिया में पहुंचने के बाद, यह 15 से 20 मिनट तक हवा में रहकर दुश्मन की सटीक लोकेशन का लाइव फीड ऑपरेटर को भेजता है।
- सुरक्षित वापसी: अगर किसी कारणवश हमला रद्द करना पड़े, तो इसमें 'ऑटोमैटिक रिटर्न-टू-बेस' और 'पैराशूट रिकवरी' सिस्टम मौजूद है। यानी यह ड्रोन सुरक्षित बेस पर लौट आएगा, जिससे यह बेशकीमती तकनीक दुश्मन के हाथ नहीं लगेगी।
खतरनाक वारहेड और अभेद्य तकनीक
इस स्वदेशी ड्रोन की मारक क्षमता इसे बेहद खास बनाती है।इसमें पोलैंड के WITU द्वारा विकसित GX-4 एंटी-टैंक वारहेड लगाया जा सकता है, जो 350-400 मिलीमीटर मोटे स्टील कवच को भी चीर सकता है।
इसके अलावा, इसमें हाई-एक्सप्लोसिव और थर्मोबैरिक (अत्यधिक दबाव और गर्मी पैदा करने वाले) बम भी लगाए जा सकते हैं।
यह आधुनिक टैंकों, गोला-बारूद के डिपो, एयर डिफेंस सिस्टम और खंदकों में छिपे दुश्मनों को पल भर में राख कर सकता है।
GPS जाम होने पर भी नहीं चूकेगा निशाना
आधुनिक युद्ध में दुश्मन अक्सर 'इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर' के जरिए GPS सिग्नल को जाम कर देते हैं।लेकिन ADSL का ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन इतना स्मार्ट है कि यह 'कैमरा गाइड' मोड के जरिए बिना GPS के भी काम कर सकता है।
जवान लाइव वीडियो फीड देखकर अपनी आंखों से टारगेट सेट कर सकता है और ड्रोन को रास्ते में भी दिशा बदलवा सकता है।
निष्कर्ष
भारतीय सेना अब 'डिसेंट्रलाइज्ड वारफेयर' यानी छोटी टुकड़ियों को मोर्चे पर स्वतंत्र रूप से अधिक ताकतवर बनाने पर जोर दे रही है।Airbornics Defence का यह नया स्वदेशी सिस्टम सेना की इसी रणनीति का एक शानदार हिस्सा है।
यह तकनीक न केवल हमारे 'सेंसर-टू-शूटर' (दुश्मन को देखने से लेकर उसे मारने तक के) समय को कम करेगी, बल्कि सरहदों पर तैनात हमारे वीर जवानों की सुरक्षा और मारक क्षमता को भी एक नया आयाम देगी।