भारत-अमेरिका ट्रेड डील में और देरी होने पर आरबीआई ब्याज दरों में कर सकता है अतिरिक्त कटौती : गोल्डमैन सैश

भारत-अमेरिका ट्रेड डील में और देरी होने पर आरबीआई ब्याज दरों में कर सकता है अतिरिक्त कटौती : गोल्डमैन सैश


मुंबई, 25 जनवरी। भारत-अमेरिका ट्रेड डील में और देरी होने पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) रेपो रेट में और कटौती कर रहा है। यह जानकारी गोल्डमैन सैश की ओर से दी गई।

गोल्डमैन सैश ने कहा कि व्यापार से जुड़ी चुनौतियां अगर वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में जारी रहती हैं और यह ग्रोथ पर अधिक असर डाल सकती हैं तो आरबीआई अर्थव्यवस्था में विकास को सपोर्ट करने के लिए ब्याज दरों में कमी करके मौद्रिक नीति को सरल बना सकता है।

ब्रोकरेज ने कहा कि भारत में खपत में रिकवरी ग्रामीण इलाकों और विशेषकर कम आय वर्ग के शहरी लोगों में अभी शुरुआती चरण में है।

अच्छी फसल, निम्न आय वाले परिवारों की महिलाओं को राज्य स्तर पर चलने वाली स्कीमों के तहत मिलने वाला नकद भुगतान और जीएसटी में कटौती से उपभोग के निचले पायदान पर मौजूद लोगों को लाभ हुआ है और इससे खपत में रिकवरी में सुधार हो रहा है।

गोल्डमैन सैश का मानना है कि ये कारक वैश्विक अनिश्चितताओं के बने रहने के बावजूद मांग में धीरे-धीरे सुधार लाने में सहायक हैं।

एनडीटीवी प्रॉफिट के साथ एक इंटरव्यू में, गोल्डमैन सैश के चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट, शांतनु सेनगुप्ता ने कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही तक अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है।

हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समझौता इस अवधि से आगे बढ़कर अगले वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाही तक टलता है, तो इससे विकास में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।

ऐसी स्थिति में, सरकार और आरबीआई को अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए नीतिगत कदम उठाने पड़ सकते हैं।

सेनगुप्ता ने बताया कि हालांकि भारत का समग्र उपभोग दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है, लेकिन आय समूहों के अनुसार स्थिति अलग-अलग है।

उच्च आय वर्ग सहित समृद्ध उपभोक्ता वर्ग की खपत में कोविड-19 महामारी के बाद मजबूत वृद्धि देखी गई, लेकिन अब इसमें मंदी के संकेत दिख रहे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि रोजगार सृजन संबंधी चिंताओं और एआई के बढ़ते उपयोग के कारण मध्यम आय वर्ग को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

नीतिगत मोर्चे पर, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026 में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण में नरमी बरती और आयकर और उपभोग कर में कटौती के माध्यम से उपभोग को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया।

इससे भारत को कैलेंडर वर्ष 2025 में 7.6 प्रतिशत की मजबूत वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर्ज करने में मदद मिली। हालांकि, नॉमिनल जीडीपी वृद्धि महामारी की अवधि को छोड़कर छह वर्षों के निचले स्तर पर आ गई, जिसका मुख्य कारण बहुत कम महंगाई दर थी।
 
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