योगी आदित्यनाथ की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी’ रिलीज: ‘बाबा आते नहीं प्रकट होते’ से बुलडोजर तक, दर्शकों को लुभा रहे डायलॉग्स

योगी आदित्यनाथ की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी’ रिलीज: ‘बाबा आते नहीं प्रकट होते’ से बुलडोजर तक, दर्शकों को लुभा रहे डायलॉग्स


लखनऊ, 20 सितंबर 2025: राजनीति के तपते रेगिस्तान में एक योगी की कहानी, जो मिट्टी से उठकर माफियाओं को मिट्टी में मिलाने की बात करता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर बनी फिल्म ‘अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी’ 19 सितंबर को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। यह फिल्म न सिर्फ उनके दबंग अंदाज को पर्दे पर उतारती है, बल्कि बचपन की मासूमियत से लेकर राजनीतिक संघर्ष तक की झलकियां दिखाती है। दर्शकों को फिल्म के डायलॉग्स खूब भा रहे हैं, जैसे ‘माफिया को मिट्टी में मिला दूंगा’ या ‘बाबा आते नहीं, प्रकट होते हैं’। हालांकि, पहले दिन लखनऊ के मल्टीप्लेक्स में दर्शक कम नजर आए, लेकिन प्रदेश के कई जिलों में उनके चाहने वालों ने थिएटर भर दिए।


अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी

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रवींद्र गौतम के निर्देशन में बनी यह फिल्म लेखक शांतनु गुप्ता की किताब ‘द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर’ से प्रेरित है। मुख्य भूमिका में अनंत जोशी ने योगी आदित्यनाथ का किरदार निभाया है, जिन्होंने योगी के बोलने-चलने के अंदाज को बखूबी अपनाया। परेश रावल ने उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ की भूमिका में जान फूंकी है, जबकि भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ एक पत्रकार के रूप में नजर आते हैं। पवन मल्होत्रा भी अहम रोल में हैं। फिल्म की म्यूजिक भी दिल को छूती है, खासकर ‘देखो बाबा बैठ गया’ जैसा गाना जो दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर देता है।

कहानी की शुरुआत: 1983 की खौफनाक घटना से​

फिल्म 1983 की एक दिल दहला देने वाली घटना से शुरू होती है, जहां पूर्वांचल में माफियाओं का खूनी खेल दिखाया गया है। बदमाश पूरी बारात को गोलियों से भून देते हैं। गोरखपुर को ‘शिकागो ऑफ द ईस्ट’ कहकर माफियाओं के वर्चस्व को दर्शाया गया है। इसके बाद कहानी योगी के बचपन की ओर मुड़ती है, जो तीन हिस्सों में बंटी है: बचपन और कॉलेज जीवन, गोरखपुर पहुंचकर उत्तराधिकारी बनना, और राजनीति में प्रवेश से सीएम बनने तक। राजनीतिक जीवन पर कम फोकस है, जबकि व्यक्तिगत संघर्ष और जिंदगी के अनछुए पहलू ज्यादा उभारे गए हैं।

बचपन के सीन्स: गौ-प्रेम और अनुशासन की कहानी​

योगी का जन्म 5 जून 1972 को पौड़ी-गढ़वाल के पंचूर गांव में हुआ। फिल्म में उनके पिता रेंजर आनंद सिंह बिष्ट के सख्त अनुशासन और मां सावित्री देवी के प्यार को खूबसूरती से दिखाया गया है। बचपन से ही योगी को गौ-सेवा पसंद थी—वे अपना पूरा भोजन गाय को खिला देते थे। बड़े भाई का पढ़ाई में मन न लगना और बस चलाने की कोशिश, फिर स्थानीय नेता से विवाद—ये सब फिल्म में जीवंत हैं। अन्याय के खिलाफ अजय (योगी का बचपन का नाम) कभी चुप नहीं बैठते, चाहे थाने में माफी मांगने का मुद्दा हो या गढ़वाल यूनिवर्सिटी में छात्रा के अपमान पर संघर्ष। छात्र संघ चुनाव में हार के बाद महंत अवैद्यनाथ से मुलाकात जीवन बदल देती है।

गोरखपुर पहुंचने का सफर: दंगों के बीच एंट्री​

बीएससी के बाद अजय चुपके से घर छोड़कर गोरखपुर जाते हैं, जहां मऊ दंगे का सामना करते हैं। मुख्तार अंसारी को ‘मुख्तार अहमद’ के रूप में दिखाया गया है, जो जीप में सवार होकर दंगा भड़काता है। यहीं निरहुआ से पहली मुलाकात होती है। 24 घंटे इंतजार के बाद महंत अवैद्यनाथ से मिलते हैं और उनके सानिध्य में आगे बढ़ते हैं। उत्तराधिकारी बनने का सीन नाटकीय है—कर्ण छेदन की रस्म में योगी कहते हैं, ‘ये दर्द नहीं, आशीर्वाद होगा’। दो साल बाद मां-पिता जब गोरखनाथ मंदिर पहुंचते हैं, तो मां का भावुक सीन दिल छू लेता है। मां गुरु से कहती हैं, ‘तुमने मेरा बेटा छीन लिया’, और गुरु जवाब देते हैं, ‘अगर कौशल्या ने राम को वनवास न जाने दिया होता, तो वो राजा बनते, भगवान नहीं’।

राजनीतिक संघर्ष: माफिया से टकराव और जापानी इंसेफेलाइटिस का दर्द​

उत्तराधिकारी बनने के बाद 26 साल की उम्र में 1998 में सांसद बनने की तैयारी दिखाई गई है। पूर्वांचल में जापानी इंसेफेलाइटिस से बच्चों की मौत देखकर दिल दुखता है। डीएम से झिड़क दिए जाने पर सांसद बनकर 36 घंटे धरना देते हैं। काफिले पर हमला, गिरफ्तारी और संसद में रोने का सीन भावुक है। फिल्म में माफिया से टकराव के डायलॉग्स दमदार हैं, जैसे जब माफिया रिश्वत देने आता है तो योगी कहते हैं, ‘मेरा बैठना तुम्हें यहां तक ले आया, सोचो मैं खड़ा हो गया तो तुम्हारा क्या होगा’। कॉलेज में वेल्डिंग वाला सीन बुलडोजर बाबा की याद दिलाता है—’20 रुपये थे तो वेल्डिंग करवाई, 200 होते तो बुलडोजर चलवा देता’। रैली में नाव से पहुंचकर ‘बाबा आते नहीं, प्रकट होते हैं’ कहना प्रशंसकों को रोमांचित कर देगा।

फिल्म की कमियां और आगे की उम्मीदें​

कहानी और कसी हो सकती थी, समापन बेहतर होता तो अच्छा लगता। पहले दिन मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली, लेकिन योगी के फैंस इसे पसंद कर रहे हैं। फिल्ममेकर्स का दावा है कि सफल हुई तो और पार्ट्स आएंगे। यह फिल्म योगी की राजनीतिक छवि से ज्यादा उनकी इंसानी जज्बे को दिखाती है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देगी। अगर आप योगी के जीवन से प्रेरणा लेना चाहते हैं, तो यह फिल्म जरूर देखें।
 

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