बांग्लादेश में राजनीति में धर्म के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता, चुनावों में दिख रहा असर: रिपोर्ट

बांग्लादेश में राजनीति में धर्म के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता, चुनावों में दिख रहा असर: रिपोर्ट


नई दिल्ली, 24 जनवरी। बांग्लादेश में राजनीति, खासकर चुनावों के दौरान, धर्म के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता गहराती जा रही है। इस विषय पर देश के एक ऑनलाइन बांग्ला समाचार पोर्टल में प्रकाशित लेख में इस प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

बांग्लान्यूज24 वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश (टीआईबी) के एक अध्ययन का हवाला देते हुए धार्मिक राजनीति के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लंबे समय से लोकतांत्रिक राजनीतिक माहौल की कमी, धार्मिक कट्टरता का प्रभाव और घरेलू, क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कट्टर राजनीतिक ताकतों के उभार ने देश में यह स्थिति पैदा की है।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनावों के दौरान कुछ राजनीतिक दल और नेता किसी खास चुनाव चिन्ह के समर्थन पर “जन्नत हासिल होने” जैसे वादे करते नजर आते हैं, जबकि कुछ अन्य इस्लामी कानूनों को लागू करने के नाम पर समर्थन मांगते हैं।

लेख में अफसोस जताया गया है कि सभ्यता के आधुनिक होने के बावजूद राजनीति में इस तरह के “धार्मिक हथकंडे” लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि बांग्लादेश में लगभग सभी दल और नेता अपने-अपने राजनीतिक हित साधने के लिए धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि धर्म आधारित राजनीतिक दलों के नेता लंबे समय से धार्मिक परिधान पहनकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आते हैं और जनसंपर्क के दौरान धर्म का खुलकर प्रयोग करते हैं।

रिपोर्ट में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी पर “जन्नत का टिकट” देने जैसे वादों के जरिए वोट मांगने के आरोपों का भी जिक्र किया गया है। वहीं, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से कहा गया है कि जमात की यह कोशिश “अंधकार युग” जैसी धार्मिक चालों से मिलती-जुलती है।

लेख में यह भी बताया गया है कि चुनावी रैलियों में पुरुष नेता धार्मिक टोपी और महिलाएं दुपट्टा या सिर ढककर मंच पर दिखाई देती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, राजनीति में धर्म के इस्तेमाल का यह चलन 1991 के चुनावों में खुलकर सामने आया था, जब बीएनपी के चुनाव प्रचार में दावा किया गया था कि अगर अवामी लीग सत्ता में आई तो अजान बंद हो जाएगी और मस्जिदों में हिंदू रीति-रिवाज शुरू हो जाएंगे।

हालांकि, रिपोर्ट में अवामी लीग को भी इससे अलग नहीं माना गया है। इसमें कहा गया है कि पार्टी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 1996 के चुनाव अभियान में काले रंग का हेडस्कार्फ और लंबी बाजू का ब्लाउज पहनकर एक दरगाह से अपनी चुनावी यात्रा की शुरुआत की थी। रिपोर्ट के अनुसार, अब चुनावों में भाग लेने से प्रतिबंधित यह पार्टी पिछले पांच चुनावों में धर्म का इस्तेमाल करती रही है।

इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया है कि इस्लामिक मूवमेंट बांग्लादेश, जिसने पहले जमात-ए-इस्लामी और नौ अन्य दलों के साथ चुनावी गठबंधन बनाया था, शरीयत कानून को लेकर मतभेद के बाद उस गठबंधन से अलग हो गया।

टीआईबी के अध्ययन का हवाला देते हुए लेख में बताया गया है कि फरवरी में होने वाले चुनाव में कुल 51 राजनीतिक दल भाग ले रहे हैं, जिनके 1,981 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें करीब 13 प्रतिशत उम्मीदवार निर्दलीय हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कुल उम्मीदवारों में इस्लामी दलों के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत है, जो पिछले पांच चुनावों में सबसे अधिक है।

तुलनात्मक रूप से, 2024 के चुनावों में इस्लामी दलों के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 9.5 प्रतिशत थी। वहीं 2018 के संसदीय चुनावों में यह बढ़कर 29.66 प्रतिशत हो गई थी, जो 2026 के फरवरी चुनाव में 36 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टीआईबी अध्ययन ने देश की आंतरिक राजनीति और प्रशासन में इस्लामी गतिविधियों के बढ़ते प्रभाव की ओर इशारा किया है।
 

Latest Replies

Trending Content

Forum statistics

Threads
8,769
Messages
8,801
Members
19
Latest member
Jessantict5434
Back
Top