यूपी पुलिस को झटका! निजी जमीन पर नमाज रोकने के फैसले को हाईकोर्ट ने पलटा, ओवैसी बोले- स्वागतयोग्य

निजी जमीन पर नमाज मामला : असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का किया स्वागत, यूपी पुलिस के आदेश को बताया अजीबोगरीब


नई दिल्ली, 14 मार्च। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल जिले में नमाज पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने वाले प्रशासनिक आदेश को खारिज कर दिया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले का स्वागत किया।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट किया, "इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला स्वागत योग्य है, जिसमें संभल पुलिस के अजीबोगरीब आदेश खारिज किए गए—निजी जमीन पर नमाज पर रोक लगाई गई थी। कानून-व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी है। यूपी में यह चलन बन रहा है: एक मामले में घर के अंदर नमाज के लिए हिरासत, संभल में 20 से ज्यादा नहीं। उम्मीद है यूपी पुलिस सीख लेगी।"

यह फैसला रमजान के दौरान निजी जमीन (जिसे याचिकाकर्ता मस्जिद बताता है) पर नमाज अदा करने से रोक लगाने के खिलाफ आया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि गाटा संख्या 291 पर मस्जिद है, जहां रमजान में बड़ी संख्या में लोग नमाज पढ़ना चाहते हैं, लेकिन स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने केवल 20 लोगों को अनुमति दी थी।

राज्य पक्ष ने मालिकाना हक पर विवाद उठाया और कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन मोहन सिंह और भूरज सिंह के नाम दर्ज है। प्रशासन का तर्क था कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के कारण संख्या सीमित की गई। कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।

बेंच ने कहा, "कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है, आम नागरिकों का नहीं। यदि एसपी और कलेक्टर को लगता है कि वे कानून का राज लागू नहीं कर सकते, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या संभल से तबादला करवा लेना चाहिए।" अदालत ने दोहराया कि निजी संपत्ति पर पूजा-अर्चना के लिए राज्य से अनुमति की जरूरत नहीं है। हस्तक्षेप केवल तब जरूरी है जब धार्मिक गतिविधि सार्वजनिक भूमि पर हो या सार्वजनिक संपत्ति तक फैले।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पूरक हलफनामा दाखिल करने का मौका दिया, जिसमें मस्जिद की तस्वीरें और राजस्व रिकॉर्ड पेश किए जाएंगे। मामले को 16 मार्च 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।
 

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