भारतीय वायु सेना ने अपनी युद्धक क्षमताओं को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है।
वायु सेना ने 'एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलों' (ALBMs) के अपने भंडार को बढ़ाने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह कदम भारत की 'कन्वेंशनल डिटरेंस' (पारंपरिक युद्ध निरोधक क्षमता) को मजबूत करने और लंबी दूरी से सटीक हमला करने की ताकत को बढ़ाने के लिए उठाया गया है।
सरल शब्दों में कहें तो, वायु सेना अब ऐसी मिसाइलों की संख्या बढ़ा रही है जो हवा से छोड़ी जाती हैं लेकिन किसी रॉकेट की तरह तूफानी रफ्तार से अपने लक्ष्य पर गिरती हैं, जिन्हें रोकना दुश्मन के लिए लगभग नामुमकिन होता है।
ALBM: दुश्मन के लिए क्यों है यह काल?
आमतौर पर मिसाइलें दो तरह की होती हैं—क्रूज मिसाइल (जो विमान की तरह सीधी उड़ती है) और बैलिस्टिक मिसाइल (जो रॉकेट की तरह ऊपर जाकर नीचे गिरती है)।ALBM इन दोनों के बीच की एक खास तकनीक है। इसे लड़ाकू विमान (Fighter Aircraft) से दागा जाता है, जिससे इसे विमान की गति का फायदा मिलता है।
लॉन्च होने के बाद यह ध्वनि से कई गुना तेज रफ्तार पकड़ती है और फिर ऊंचाई से एक तीखे कोण (Steep Dive) पर अपने लक्ष्य पर गिरती है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को इसे पकड़ने या गिराने का वक्त ही नहीं मिलता।
वायु सेना को इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
इस फैसले के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण माने जा रहे हैं:- बदलते खतरे: हमारे पड़ोसी देशों ने अपनी सीमाओं पर बेहद आधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क (जैसे S-400 या HQ-9 जैसे सिस्टम) तैनात कर दिए हैं। इन सुरक्षा घेरों को भेदने के लिए साधारण मिसाइलें काफी नहीं हैं।
- कठोर ठिकाने: दुश्मन के बंकर, कमांड सेंटर, रडार साइट और रनवे अक्सर बहुत मजबूत कंक्रीट के बने होते हैं। उन्हें नष्ट करने के लिए ALBM जैसी तेज रफ्तार और भारी मारक क्षमता वाली मिसाइल की जरूरत होती है।
- स्टैंड-ऑफ क्षमता: वायु सेना चाहती है कि उनके फाइटर जेट दुश्मन की सीमा में ज्यादा अंदर जाए बिना, दूर से ही (Standoff distance) हमला करके सुरक्षित वापस लौट सकें।
'ऑपरेशनल अनुभव' और नई तैयारी
ओपन सोर्स जानकारी और हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय वायु सेना ने हाल के वर्षों में इज़राइल से 'Rampage' (जिसे High Speed Low Drag-Mk2 भी कहा जाता है) और 'ROCKS' (Crystal Maze-2) जैसी मिसाइलों को अपने बेड़े में शामिल किया है।सुखोई-30 MKI जैसे विमानों पर इनकी तैनाती और परीक्षण ने यह साबित कर दिया है कि युद्ध के शुरुआती दौर में गति और सटीकता ही जीत की कुंजी है।
सूत्रों का कहना है कि अब वायु सेना केवल 'दिखावे' के लिए नहीं, बल्कि लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता (Mass and Sustainability) विकसित करना चाहती है। आधुनिक युद्धों से यह सबक मिला है कि असली लड़ाई में मिसाइलें बहुत तेजी से खर्च होती हैं, इसलिए गोदामों में इनका बड़ा भंडार होना जरूरी है।
भविष्य की योजना: 'मेक इन इंडिया' पर जोर
सिर्फ विदेशी खरीद ही नहीं, बल्कि भारतीय रक्षा योजनाकार (Defence Planners) इन मिसाइलों को भारत में ही बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। इससे न केवल लागत कम होगी, बल्कि युद्ध के समय विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता भी खत्म हो जाएगी।DRDO द्वारा विकसित की जा रही 'रुद्रम' (Rudram) सीरीज की मिसाइलें भी इसी दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही हैं।
यह बदलाव साफ तौर पर दिखाता है कि भारतीय वायु सेना अब सिर्फ 'रक्षात्मक' (defensive) नहीं रही, बल्कि वह युद्ध के पहले ही घंटे में दुश्मन पर भारी पड़ने वाली 'आक्रामक' (proactive) ताकत बनने की ओर अग्रसर है।