ईरान में कैसा था राजशाही शासन? इस्लामिक क्रांति के बाद शाह शासन का अंत और धार्मिक सत्ता की हुई शुरुआत

ईरान में कैसा था राजशाही शासन? इस्लामिक क्रांति के बाद शाह शासन का अंत और धार्मिक सत्ता की हुई शुरुआत


नई दिल्ली, 10 मार्च। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव लगातार जारी है। दोनों तरफ से ताबड़तोड़ हमले किए जा रहे हैं। अमेरिकी सरकार ने पहले ही कह दिया है कि ईरान में खामेनेई की सरकार का पतन होगा और वहां के लोगों की पसंद का शासन स्थापित होगा। वहीं ईरान की वर्तमान सरकार भी पीछे ना हटने पर अड़ी है।

हालांकि, ईरान में हमेशा से ऐसी स्थिति नहीं थी। खासकर अगर महिलाओं की बात करें, तो इस देश की महिलाएं वर्तमान समय से कई सदी आगे चल रही थीं। इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में तेजी से बदलाव देखने को मिला।

ईरान में 1979 के समय में इस्लामिक क्रांति हुई, जिसके बाद वहां के माहौल में तेजी से परिवर्तन हुआ। खासतौर से महिलाओं के मूल अधिकारों में भी बदलाव देखने को मिला। इस्लामिक क्रांति के बाद ही ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब की शुरुआत हुई। ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले राजतंत्र था।

इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान की जिम्मेदारी पहलवी राजवंश के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के पास थी। उन्होंने ईरान को विकास के रास्ते पर लाने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए। सफेद क्रांति इनमें से एक है, जिसका मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार, औद्योगीकरण और शिक्षा का विस्तार करना था।

अंतिम शाह के शासन में ईरान के अमेरिका और ब्रिटेन के साथ बेहद अच्छे संबंध थे। ईरान और यूएस-यूके के बीच पश्चिमी पहनावा, संगीत और जीवनशैली एक अहम कड़ी थे। इनके शासन में महिलाओं के अधिकार में शिक्षा, रोजगार और वोटिंग का हक शामिल हुआ। पहलवी राजवंश के शासन काल में ईरान की अर्थव्यवस्था भी तेजी से आगे बढ़ रही थी। हालांकि, भ्रष्टाचार और राजनीतिक दमन की वजह से यहां पर शाही शासन के पतन का दौर शुरू हुआ।

धीरे-धीरे ईरान की जनता और धार्मिक समूहों में राजशाही शासन के खिलाफ असंतोष की भावना पैदा होने लगी। लोगों को लग रहा था कि शाही शासन पश्चात्य नीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक दमन से प्रेरित है। विद्रोह की चिंगारी सुलगी और 1979 में देश से राजशाही शासन को उखाड़कर फेंक दिया गया। इसके बाद से अब तक शाही परिवार को देश निकाला में रहना पड़ा।

इस्लामिक क्रांति का मुख्य कारण सफेद क्रांति, राजनीतिक दमन, आर्थिक असमानता, पाश्चात्य का प्रभाव, भ्रष्टाचार और खामेनेई का नेतृत्व था। शाह की सफेद क्रांति (जैसे भूमि सुधार और महिलाओं के अधिकार) को मौलवियों ने अपनी शक्ति और इस्लामी परंपराओं पर हमले के रूप में देखा।

इसके बाद ईरान में आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई। यहां से ईरान में राजशाही खत्म हुई और 'विलायत-ए-फकीह' के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था बनी। इसके तहत अंतिम शक्ति सुप्रीम लीडर (सर्वोच्च नेता) के पास होती है। देश में शरिया कानून का अनुसरण किया जाने लगा। यहां से महिलाओं के लिए हिजाब की एंट्री और पश्चिमी मनोरंजन पर प्रतिबंध का आगाज हुआ।

इस्लामिक क्रांति के बाद हालात ऐसे हुए कि ईरान में शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी तो बढ़ी, लेकिन उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक अधिकारों पर कड़े अंकुश लग गए। विश्वविद्यालयों में महिलाओं की संख्या 33 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत पहुंच गई और उनके अन्य सामाजिक अधिकारों पर पाबंदियां लगीं।

1979 के बाद से अब तक ईरान में तीन सर्वोच्च नेता हुए, पहले रुहोल्लाह खुमैनी, दूसरे अली खामेनेई और तीसरे अयातुल्लाह सैय्यद मोजतबा हुसैनी खामेनेई। 1989 में अमेरिकी हमले में खुमैनी की मौत के बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुप्रीम लीडर बनाया गया। इसके बामार्च 2026 में अमेरिका और इजरायल के हमले में अली खामेनेई ढेर हो गए। इसके बाद अली खामेनेई के बेटे मोजतबा हुसैनी खामेनेई को ईरान का तीसरा सुप्रीम लीडर बनाया गया।

भले ही ईरान में नियमित अंतराल पर चुनाव होते हैं, लेकिन शिया धर्मगुरुओं के पास ही यहां अंतिम अधिकार होता है। खुमैनी ने इस्लामिक क्रांति को अंजाम देने के लिए सबसे पहले इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) का गठन किया।

ईरान में सर्वोच्च नेता का चयन 'विशेषज्ञों की सभा' करती है, जो 88 मौलवियों की एक बॉडी है। इन मौलवियों को हर आठ साल में जनता अपने मतदान के जरिए चुनती है। ईरान के सुप्रीम लीडर का चयन इस आधार पर होता है कि उसके पास इस्लामी कानून (शरीयत) का गहरा ज्ञान, राजनीतिक सूझबूझ, और न्याय देने जैसी खासियतें हों।

ईरान में सर्वोच्च नेता को 'सैयद' माना जाता है, यानी वह अपनी वंश परंपरा में पैगंबर मोहम्मद से जुड़े हैं। यह वंशावली पैगंबर के पोते इमाम हुसैन के माध्यम से सीधे उनसे जुड़ी मानी जाती है।

शिया इस्लाम में प्रतीकों का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार, जो धार्मिक विद्वान पैगंबर के प्रत्यक्ष वंशज होते हैं, वे 'काली पगड़ी' धारण करते हैं, जबकि अन्य विद्वान 'सफेद पगड़ी' पहनते हैं। शिया विचारधारा में पैगंबर के वंश से होना नेतृत्व के लिए उच्च नैतिक और धार्मिक अधिकार का प्रतीक माना जाता है।
 

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