पश्चिम बंगाल में मुख्य चुनाव आयुक्त को काले झंडे! डॉ. संतोष सुमन बोले: संवैधानिक संस्थाओं का अपमान लोकतंत्र के लिए खतरा

पश्चिम बंगाल में संवैधानिक संस्थाओं का अपमान बेहद चिंताजनक, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए – डॉ. संतोष कुमार सुमन


पटना, 9 मार्च। बिहार सरकार के लघु जल संसाधन मंत्री एवं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (से.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार सुमन ने पश्चिम बंगाल में मुख्य चुनाव आयुक्त को काले झंडे दिखाए जाने और हाल के दिनों में संवैधानिक पदों के प्रति हो रहे अपमानजनक व्यवहार पर गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त की है।

डॉ. सुमन ने कहा कि पश्चिम बंगाल में जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कोलकाता में विरोध और काले झंडों का सामना करना पड़ा, वह केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि देश की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था का अपमान है। लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की गरिमा और स्वतंत्रता सर्वोपरि होती है, लेकिन राज्य सरकार के संरक्षण में इस प्रकार का माहौल बनना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और खतरनाक संकेत है।

उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति अब खुले तौर पर तुष्टिकरण और घुसपैठियों को संरक्षण देने तक सीमित हो गई है। यह बेहद चिंताजनक है कि राज्य की सरकार ऐसे तत्वों को बढ़ावा दे रही है जो देश की संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती दे रहे हैं।

डॉ. संतोष कुमार सुमन ने कहा कि हाल ही में जिस तरह से देश की राष्ट्रपति के प्रति भी गैरजिम्मेदाराना बयान और व्यवहार देखने को मिला, वह भी अत्यंत निंदनीय है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति देश की सर्वोच्च संवैधानिक गरिमा का प्रतीक होते हैं, और उनके प्रति इस प्रकार का रवैया पूरे राष्ट्र का अपमान है।

उन्होंने कहा कि लगातार हो रही इन घटनाओं से यह स्पष्ट हो रहा है कि पश्चिम बंगाल की सरकार का मिजाज अब संवैधानिक मर्यादाओं और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होता जा रहा है। राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति भी लगातार बिगड़ रही है और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान सुरक्षित नहीं रह गया है।

डॉ. सुमन ने केंद्र सरकार से मांग की कि पश्चिम बंगाल की मौजूदा परिस्थितियों को गंभीरता से लेते हुए वहां राष्ट्रपति शासन लागू करने पर विचार किया जाए, ताकि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को सुरक्षित रखा जा सके।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन संवैधानिक पदों और संस्थाओं का अपमान किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
 

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