नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग: बिहार में शुरू हुआ विकास संवाद, वैश्विक चुनौतियों के बीच गढ़ा जाएगा उज्ज्वल भविष्य

बिहार: नालंदा विश्वविद्यालय में 'नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग' का शुभारंभ, विकास के भविष्य पर मंथन


राजगीर, 8 मार्च। बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय के राजगीर परिसर में रविवार को दो दिवसीय 'नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग 2026' के प्रथम संस्करण का शुभारंभ किया गया। इसमें भारत और विदेश के प्रमुख नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और विकास विशेषज्ञों ने वैश्विक विकास की उभरती चुनौतियों तथा 2030 के बाद की विकास रूपरेखा पर विचार-विमर्श किया।

पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन किया गया। इस अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार की शुरुआत नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी के स्वागत वक्तव्य से हुई, जिसमें उन्होंने विकास, समानता और सततता से जुड़े वैश्विक संवादों को पुनर्जीवित करने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग जैसे मंच उभरती चुनौतियों जैसे बढ़ती असमानताएं, आर्थिक विकास की पारिस्थितिक सीमाएं और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य से निपटने के साथ-साथ 2030 के बाद के विकास एजेंडे के लिए नए विचारों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि अकादमिक जगत और नीति-निर्माण के बीच सेतु स्थापित करने वाला समावेशी और अंतःविषय संवाद आवश्यक है, ताकि विशेषकर ग्लोबल साउथ के दृष्टिकोण से संतुलित और न्यायसंगत विकास को आगे बढ़ाया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य एवं भारत सरकार में सचिव डॉ. शमिका रवि ने अपने वक्तव्य में विकास यात्रा का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने आर्थिक परिवर्तन, गरीबी उन्मूलन और क्षेत्रीय विकास की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए श्रम बाजार, लैंगिक भागीदारी और वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों से जुड़ी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका एक अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक अध्याय है।

अपने प्रारंभिक संबोधन में येल विश्वविद्यालय के ग्लोबल जस्टिस प्रोग्राम के निदेशक और दार्शनिक प्रो. थॉमस पोगे ने विकास के पारंपरिक मापदंडों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए कहा कि जीडीपी और सकल राष्ट्रीय आय जैसे संकेतक समाज में असमानता, मानव कल्याण और पर्यावरणीय प्रभावों को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते। उन्होंने कहा कि 2030 के बाद के विकास विमर्श को सार्थक बनाने के लिए विकास के आकलन को व्यक्ति केंद्रित, बहुआयामी और नैतिक दृष्टिकोण पर आधारित बनाना होगा।

विख्यात अर्थशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एमेरिटस प्रोफेसर प्रो. दीपक नय्यर ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा जैसी साझा चुनौतियों से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग पहले की तरह ही महत्वपूर्ण बना हुआ है। सेंटर फॉर स्टडीज इन डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी द्वारा आयोजित यह संवाद विकास, सततता और वैश्विक सहयोग से जुड़े विषयों पर अकादमिक और नीतिगत विमर्श को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच है।
 

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