राजगीर, 7 मार्च। बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में आठ मार्च, यानी रविवार से दो दिवसीय 'नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग (एनडीडी)' का आयोजन किया जा रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय नीति सेमिनार में वैश्विक नीति-निर्माताओं, विकास विशेषज्ञों और विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों तथा विचारकों को एक साझा मंच पर लाकर सतत, समावेशी विकास और समकालीन वैश्विक चुनौतियों व अवसरों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
नालंदा विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर स्टडीज इन डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी (सीएसडीएस) द्वारा आयोजित इस अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के पहले संस्करण को नीति संवाद और ज्ञान-विनिमय के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में परिकल्पित किया गया है। इसमें मुख्य व्याख्यान, विषयगत सत्र और नीति विमर्श आयोजित होंगे, जिनमें सतत विकास, क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक परिवर्तन तथा वैश्विक साझेदारी जैसे विषयों पर गहन चर्चा की जाएगी।
यह पहल प्राचीन नालंदा की ज्ञान-विद्या संवाद परंपरा से प्रेरित है, जहां विश्वभर से विद्वान विचारों के आदान-प्रदान के लिए एकत्रित होते थे। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने बताया, "नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग प्राचीन नालंदा की वैश्विक बौद्धिक संवाद परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए सतत और समावेशी विकास पर सार्थक नीति विमर्श को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।"
इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में भारत और विदेश से कई प्रतिष्ठित विद्वान और नीति विशेषज्ञ भाग लेंगे। प्रमुख वक्ताओं और प्रतिभागियों में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य एवं भारत सरकार में सचिव डॉ. शामिका रवि, येल विश्वविद्यालय के प्रो. थॉमस पोगे, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के एमेरिटस प्रोफेसर प्रो. दीपक नय्यर, नेशनल ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट फॉर पॉलिसी स्टडीज, टोक्यो के प्रोफेसर टेट्सुशी सोनबे, जर्मन इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी के स्टेफन क्लिंगेबिल, इंटरनेशनल पॉलिसी सेंटर फॉर इन्क्लूसिव डेवलपमेंट के आंद्रे दे मेलो ई सूज़ा सहित विभिन्न प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों और शोध संगठनों से जुड़े अनेक प्रमुख शिक्षाविद, नीति-निर्माता और विकास विशेषज्ञ शामिल होंगे।
उन्होंने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन नालंदा की ज्ञान परंपरा से प्रेरणा लेते हुए वैश्विक बौद्धिक संवाद को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह आयोजन अकादमिक जगत और नीति-निर्माण के बीच सार्थक संवाद को सुदृढ़ करने का प्रयास है।