साहिर के मार्मिक बोल, 'बाबुल की दुआएं' गाते मोहम्मद रफी हुए भावुक, रो पड़े थे फूट-फूटकर

जब साहिर के बोलों ने छू लिया मोहम्मद रफी का दिल, 'बाबुल की दुआएं' गाते वक्त फफक कर रो पड़े थे गायक


मुंबई, 7 मार्च। 8 मार्च के दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है, जो महिलाओं की उपलब्धियों और संघर्ष को सम्मान देता है, वहीं दूसरी ओर हिंदी सिनेमा के महान शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की जयंती भी है। साहिर ने अपनी कलम से समाज के दर्द, प्रेम, विद्रोह और मानवीय भावनाओं को अमर कर दिया। उनकी शायरी और गीत आज भी दिलों में जिंदा हैं। लेकिन सबसे दिल छू लेने वाली बात यह है कि उनके एक गीत को गाते वक्त महान गायक मोहम्मद रफी भी रो पड़े थे।

8 मार्च 1921 को पंजाब के लुधियाना में जन्मे साहिर (असली नाम अब्दुल हई) के शब्दों के जादू का संगीतकार रवि ने एक इंटरव्यू में जिक्र करते हुए बताया था, साल 1968 में रिलीज फिल्म 'नील कमल' के गाने "बाबुल की दुआएं लेती जा" में साहिर के लिखे बोल इतने भावुक थे कि रिहर्सल के दौरान ही रफी साहब की आंखें नम हो गईं। उस वक्त सामने से रफी साहब को रोता देख रवि घबरा गए और बाहर बुलाकर उनसे वजह पूछा तो रफी ने बताया कि उनकी बेटी की हाल ही में एंगेजमेंट हुई थी, जिसकी वजह से वह भावनाओं को रोक न सके और गाने की विदाई और पिता की दुआओं की भावना उनकी असल जिंदगी से जुड़ गई, जिससे दिल भर आया।

खास बात है कि रिकॉर्डिंग में भी रफी की आवाज में थरथराहट और रोने का एहसास साफ सुनाई देता है। इस गाने की फीलिंग इतनी गहरी थी कि रफी ने इसे रिकॉर्ड करने के लिए शादी का फंक्शन छोड़ दिया और पारिश्रमिक भी नहीं लिया। गाना नेशनल अवॉर्ड भी जीता और आज भी हर शादी में विदाई के पल में बजता है।

साहिर साहब की लेखनी बहुमुखी थी। वह भजन, कव्वाली, रोमांटिक और व्यंग्यात्मक गीत लिखते थे। 'नील कमल' में ही एक और मजेदार गाना था "खाली डब्बा, खाली बोतल", जिसे मन्ना डे ने गाया और महमूद पर फिल्माया गया। बोल थे, "खाली डब्बा, खाली बोतल ले ले मेरे यार, खाली से मत नफरत करना, खाली सब संसार। बड़ा बड़ा सर खाली डब्बा, बड़ा बड़ा तन खाली बोतल... वो भी आधे खाली निकले जिन पर लगा था भरे का लेबल।" यह जीवन की खोखलापन पर गहरा व्यंग्य था, बाहर से भरा दिखने वाले लोग अंदर से खाली होते हैं। साहिर ने फिल्मों को ऐसे गीत दिए जो साहित्य की ऊंचाई तक पहुंचे।

"तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा" जैसे बोल सामाजिक एकता सिखाते हैं। उनकी शायरी में प्रगतिशीलता और संवेदनशीलता का संतुलन था। संगीतकार रवि ने बताया था कि वह वे मूडी थे – सिचुएशन लेकर गायब हो जाते, लेकिन परफेक्ट गीत लेकर लौटते। क्रेडिट देने में उदार थे, कभी सहकर्मी की लाइनें भी अपना क्रेडिट नहीं लेते थे।
 

Similar threads

Forum statistics

Threads
14,725
Messages
14,762
Members
20
Latest member
7519202689
Back
Top