महिला दिवस विशेष: धरती से चांद तक, भारतीय नारी शक्ति ने संभाली कमान, कामयाबी का परचम लहराया

महिला दिवस विशेष : धरती से आसमान तक कामयाबी का परचम लहराने वाली भारतीय महिलाएं


नई दिल्ली, 7 मार्च। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान में भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने न केवल देश का नाम रोशन किया है, बल्कि पूरी दुनिया को दिखाया है कि मेहनत और लगन से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। चंद्रयान, मंगलयान और अन्य महत्वाकांक्षी मिशनों में महिलाओं की भूमिका इतनी अहम रही है कि इसरो की सफलताओं का आधा श्रेय इन्हें जाता है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इन बहादुर और प्रतिभाशाली महिलाओं की कहानी जानना जरूरी है।

चंद्रयान-2 भारत का दूसरा चंद्र मिशन था, जिसकी कमान दो महिला वैज्ञानिकों ने संभाली। मुथैया वनिता प्रोजेक्ट डायरेक्टर थीं, जो इसरो में इस स्तर पर पहुंचने वाली पहली महिला वैज्ञानिक बनीं। उन्होंने पूरे प्रोजेक्ट के फैसले लिए और टीम का नेतृत्व किया। वनिता डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग में माहिर हैं। उन्होंने कार्टोसैट-1 और ओशनसैट-2 जैसे उपग्रहों में अहम भूमिका निभाई। उन्हें एस्ट्रोनॉटिकल सोसायटी ऑफ इंडिया का सर्वश्रेष्ठ महिला वैज्ञानिक पुरस्कार और नेचर जर्नल की 'प्रॉमिसिंग साइंटिस्ट' सूची में जगह मिली।

वहीं, ऋतु करिधल जो चंद्रयान-2 मिशन की डायरेक्टर थीं। उनका मुख्य काम चंद्रयान-2 को चंद्रमा की कक्षा में सुरक्षित पहुंचाना था। उन्होंने मंगलयान में भी डिप्टी ऑपरेशंस डायरेक्टर के तौर पर काम किया। ऋतु ने आईआईएससी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स किया और 2007 में इसरो का यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड जीता। चंद्रयान-2 में करीब 30 प्रतिशत टीम सदस्य महिलाएं थीं, जो युवा लड़कियों के लिए प्रेरणा है।

मंगलयान की सफलता में भी महिलाओं का अहम योगदान रहा। साल 2014 में भारत ने पहली कोशिश में ही मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचकर इतिहास रच दिया था। इस मिशन में भी महिलाओं ने बड़ी भूमिका निभाई, जिसमें नंदिनी हरिनाथ डिप्टी ऑपरेशंस डायरेक्टर थीं। 20 साल से इसरो में काम कर रही नंदिनी ने 14 मिशनों में योगदान दिया है। वहीं, ऋतु करिधल ने मंगलयान के प्रक्षेपण वक्र की गणना और स्वचालित सॉफ्टवेयर डिजाइन में मदद की।

अनुराधा टी.के. इसरो की वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने जीसैट-12 और जीसैट-10 जैसे संचार उपग्रह लॉन्च किए। वे जीसैट प्रोग्राम डायरेक्टर हैं और कई विदेशी ऑफर ठुकराकर देश के लिए काम कर रही हैं। मीनल संपत ने मंगलयान के लिए तीन उपकरण बनाए- इंफ्रारेड कैमरा, मीथेन सेंसर और जीवन खोजने वाला यंत्र। उन्होंने दो साल तक 18 घंटे रोज काम किया और कोई छुट्टी नहीं ली। इस सूची में मौमिता दत्ता का भी नाम शामिल है, जिन पर मीथेन सेंसर प्रोजेक्ट की जिम्मेदार थीं और ऑप्टिकल सिस्टम विकसित किया।

इन महिला वैज्ञानिकों की मेहनत, समर्पण और नेतृत्व ने भारत को अंतरिक्ष की दुनिया में मजबूत स्थान दिलाया। इनकी सफलता युवा लड़कियों को विज्ञान की ओर प्रेरित करती है और साबित करती है कि महिलाएं धरती से आसमान तक हर मुकाम हासिल कर सकती हैं।

अंतरिक्ष की दुनिया में सफलता हासिल करने वाली महिलाओं के अन्य उल्लेखनीय नामों में ललितांबिका ए.आर. भी शामिल हैं, जिन्होंने 104 उपग्रह लॉन्च करने वाली टीम का नेतृत्व किया, जो दुनिया में रिकॉर्ड है। वे गगनयान मिशन की जिम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं। एन. वारलारमती ने रिसेट-वन जैसे रडार इमेजिंग उपग्रह लॉन्च किए। कीर्ति फौजदार उपग्रहों को सही कक्षा में स्थापित करने में माहिर हैं।
 

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