नई दिल्ली, 6 मार्च। महिलाओं के जीवन में मेनोपॉज एक ऐसा समय होता है, जिसे अक्सर लोग बदलाव के दौर के रूप में देखते हैं। आमतौर पर यह 45 से 55 वर्ष की उम्र में आता है, जब शरीर में हार्मोनल बदलाव शुरू हो जाते हैं और पीरियड्स लगातार 12 महीने तक नहीं होते। हालांकि, यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इसके प्रभाव शरीर और मन दोनों पर देखे जा सकते हैं, इसलिए इस बदलाव को समझना बेहद जरूरी है।
मेनोपॉज के दौरान सबसे बड़ा बदलाव हार्मोनल होता है। शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर धीरे-धीरे कम हो जाता है। यह बदलाव केवल मासिक चक्र को बंद करने तक सीमित नहीं रहता। हार्मोन की कमी से मूड में उतार-चढ़ाव, चिड़चिड़ापन और नींद की समस्याएं आम हो जाती हैं। कई महिलाओं को रात में नींद ठीक से नहीं आती या वे जल्दी जाग जाती हैं। आयुर्वेद में इसे वात दोष के असंतुलन से जोड़ा गया है, और इसे नियंत्रित करने के लिए गर्म और पोषक आहार के साथ मेडिटेशन और एक्सरसाइज की सलाह दी जाती है।
एस्ट्रोजन का प्रभाव हड्डियों और हृदय से जुड़ा है। यह हार्मोन हड्डियों की मजबूती बनाए रखने में मदद करता है। मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन की कमी के कारण बोन डेंसिटी कम होने लगती है। इससे महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। हृदय पर भी इसका प्रभाव पड़ता है, क्योंकि एस्ट्रोजन हृदय और रक्त वाहिकाओं को सुरक्षित रखने में मदद करता है। इसकी कमी से ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण कम हो जाता है और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए विशेषज्ञ हमेशा संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और समय-समय पर हेल्थ चेकअप की सलाह देते हैं।
त्वचा और बाल भी मेनोपॉज के दौरान प्रभावित होते हैं। एस्ट्रोजन की कमी से कोलेजन प्रोटीन कम बनने लगता है, जिससे त्वचा पतली और रूखी महसूस होती है। बालों का झड़ना बढ़ सकता है और उनकी चमक कम हो जाती है। आयुर्वेद में इसके लिए तिल, अलसी, मेथी और हरी सब्जियों जैसे पोषक तत्वों को आहार में शामिल करने की सलाह दी जाती है। ये न सिर्फ त्वचा और बालों को पोषण देते हैं, बल्कि हड्डियों और हृदय के लिए भी लाभकारी होते हैं।