अमेरिका की नई कृषि नीति: भारत-चीन बाजार पर पैनी नजर, निर्यात बढ़ाकर व्यापार घाटा पाटने की तैयारी

अमेरिका की कृषि व्यापार नीति: भारत और चीन पर फोकस, निर्यात बढ़ाने की योजना बनाई


वॉशिंगटन, 5 मार्च। अमेरिका की कृषि व्यापार नीति अब भारत और चीन जैसे बड़े देशों पर ज्यादा ध्यान दे रही है। अमेरिकी कृषि विभाग के अधिकारी ल्यूक लिंडबर्ग ने सांसदों को बताया कि इससे अमेरिका के लिए नए निर्यात अवसर बनेंगे। हालांकि इस दौरान सांसदों के बीच टैरिफ, खाद्य सहायता नीति और बढ़ते कृषि व्यापार घाटे को लेकर तीखी बहस भी देखने को मिली।

कई सांसदों ने यह भी पूछा कि अमेरिका आयात पर निर्भरता कैसे कम करेगा और घरेलू उत्पादन कैसे बढ़ाएगा। इस पर लिंडबर्ग ने स्वीकार किया कि कुछ क्षेत्रों में आयात पर काफी निर्भरता है। उदाहरण के तौर पर अमेरिका अपने लगभग 75 प्रतिशत समुद्री खाद्य पदार्थ आयात करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को उम्मीद है कि कृषि व्यापार घाटे में सुधार होगा और इस साल यह घटकर लगभग 29 अरब डॉलर रह सकता है। लिंडबर्ग के अनुसार अगर अमेरिका घरेलू उत्पादन और निर्यात दोनों को बढ़ाए तो इससे किसानों को फायदा होगा। हम चाहते हैं कि अमेरिका में ज्यादा उत्पादन हो। हम अपने देश में उगाए गए खाद्य पदार्थों का अधिक उपभोग करें और साथ ही उनका निर्यात भी बढ़ाएं।

बुधवार (स्थानीय समय) को कृषि बजट की निगरानी करने वाली प्रतिनिधि सभा की एक उपसमिति के सामने पेश होते हुए कृषि विभाग में व्यापार और विदेशी कृषि मामलों के अवर सचिव ल्यूक लिंडबर्ग ने कहा कि प्रशासन “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण के तहत व्यापार नीति को आगे बढ़ा रहा है, जिसका उद्देश्य वैश्विक बाजारों में अमेरिकी कृषि की प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना है। हमारा मिशन वैश्विक बाजारों में निष्पक्षता और पारस्परिकता बहाल करना और अमेरिका के कृषि व्यापार संतुलन को फिर से सरप्लस में लाना है।

उन्होंने बताया कि हमारी रणनीति तीन प्रमुख स्तंभों—बेहतर व्यापार समझौते करने, खरीदार और विक्रेता के संबंधों को मजबूत बनाने तथा व्यापारिक भागीदारों को जवाबदेह बनाने पर आधारित है। लिंडबर्ग ने एशिया में हाल की वार्ताओं और समझौतों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जापान, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों में अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाजार पहुंच का विस्तार हुआ है।

उन्होंने चीन को भी अमेरिकी कृषि निर्यात के लिए एक अहम बाजार बताया। उनके अनुसार इस विपणन वर्ष में चीन ने अमेरिका से 1.2 करोड़ मीट्रिक टन सोयाबीन खरीदा है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जल्द ही चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से व्यापार प्रतिबद्धताओं को मजबूत करने के लिए बातचीत कर सकते हैं।

सांसदों ने भारत में भी संभावित अवसरों पर सवाल उठाए, खासकर ट्री नट्स और विशेष फसलों के लिए। भारत में पेकान जैसे उत्पादों पर कभी-कभी 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाता रहा है। इस पर लिंडबर्ग ने कहा कि भारत के साथ नए समझौते को लेकर बातचीत अभी जारी है और उम्मीद है कि पेकान जैसे उत्पाद भी इसमें शामिल होंगे।

उन्होंने बताया कि अमेरिका मध्य अमेरिका और यूरोप में भी नए व्यापार अवसर तलाश रहा है। उदाहरण के तौर पर ग्वाटेमाला ने हर साल अमेरिका से 5 करोड़ गैलन एथेनॉल खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है, वहीं कई बाजारों में अमेरिकी बीफ और अन्य कृषि उत्पादों के लिए पहुंच बढ़ी है।

हालांकि सुनवाई के दौरान अमेरिकी कृषि व्यापार नीति को लेकर राजनीतिक मतभेद भी सामने आए। डेमोक्रेट सांसदों ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ की आलोचना की और कहा कि इससे किसानों की लागत बढ़ रही है तथा अन्य देशों की जवाबी कार्रवाई से उन्हें नुकसान हो सकता है।

रैंकिंग मेंबर सैनफोर्ड डी. बिशप जूनियर ने चेतावनी दी कि सरकार की व्यापार नीति ने अमेरिकी प्रोड्यूसर्स पर बढ़ते दबाव में योगदान दिया है। उन्होंने लंबे समय से चल रहे फूड फॉर पीस प्रोग्राम को अंतरराष्ट्रीय विकास से जुड़े अमेरिकी एजेंसी से कृषि विभाग में ट्रांसफर करने पर भी चिंता जताई।

यह प्रोग्राम विदेशों में कमजोर आबादी को अमेरिका में उगाए गए खाने की मदद देता है। नए अरेंजमेंट के तहत, यूएसडीए ने पहले ही वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के जरिए कई देशों में डिलीवर किए जाने वाले 211,000 मीट्रिक टन अमेरिकी सामान खरीदने के लिए 452 मिलियन डॉलर खर्च करने की योजना की घोषणा की है।

इसके साथ ही, कई सीनेटरों ने लिंडबर्ग पर दबाव डाला कि अमेरिका इंपोर्ट कम करने और घरेलू प्रोडक्शन को मजबूत करने की योजना कैसे बना रहा है। लिंडबर्ग ने माना कि कुछ क्षेत्रों को इंपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भरता का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, "हम अपने लगभग 75 फीसदी सीफूड को इंपोर्ट करते हैं, और कहा कि घरेलू प्रोड्यूसर मार्केट में ज्यादा सप्लाई कर सकते हैं।

लिंडबर्ग ने कहा कि अमेरिका में उगाए गए खाने की चीजों की घरेलू खपत बढ़ाते हुए एक्सपोर्ट बढ़ाने से आखिर में अमेरिकी किसानों को फायदा होगा। उन्होंने कहा, "हम यहां अमेरिका में ज्यादा प्रोडक्शन करना चाहते हैं, जो हम यहां यूएस में पैदा करते हैं उसका ज्यादा इस्तेमाल करना चाहते हैं और ज्यादा एक्सपोर्ट भी करना चाहते हैं।"
 

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