अर्जुनी वन में मादा गौर शिकार मामले में बड़ा अपडेट: दो फरार आरोपियों ने किया आत्मसमर्पण, जेल भेजे गए

वन परिक्षेत्र अर्जुनी में मादा गौर शिकार मामले में दो और आरोपी गिरफ्तार


रायपुर, 28 फरवरी। वन परिक्षेत्र अर्जुनी में सामने आए मादा गौर शिकार प्रकरण में बड़ा अपडेट सामने आया है। लंबे समय से फरार चल रहे आरोपियों में से दो ने आखिरकार न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण के बाद दोनों को न्यायिक प्रक्रिया के तहत जेल भेज दिया गया। इस कार्रवाई के बाद मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बढ़ गई है, जबकि शेष फरार आरोपियों की तलाश अब भी जारी है।

वन विभाग के मुताबिक, यह मामला अत्यंत गंभीर है और इसके तहत वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 के प्रावधानों के अंतर्गत अपराध दर्ज किया गया है। मादा गौर, जैसे संरक्षित वन्यजीव का शिकार न केवल कानूनी रूप से दंडनीय है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा माना जाता है।

सूत्रों के अनुसार, घटना के बाद से ही वन विभाग ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए विशेष रणनीति बनाई थी। लगातार गश्त, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर और मुखबिर तंत्र को सक्रिय कर आरोपियों की तलाश की जा रही थी। इसी दबाव के चलते मुख्य आरोपी जगदीश चौहान और अभिमन्यु चौहान, दोनों निवासी बिलाड़ी, ने न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण के बाद विधि अनुसार कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेज दिया गया। इससे पहले तीन अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। अब तक कुल पांच आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में हैं। हालांकि, प्रकरण में कुछ अन्य लोग अब भी फरार बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश तेज कर दी गई है।

वन परिक्षेत्र अर्जुनी के अंतर्गत अक्टूबर माह में मादा गौर के शिकार की घटना सामने आई थी। स्थानीय ग्रामीणों से मिली सूचना और प्राथमिक जांच के बाद वन विभाग ने मौके पर पहुंचकर साक्ष्य जुटाए। जांच में स्पष्ट हुआ कि यह सुनियोजित शिकार था। मादा गौर, जिसे भारतीय बाइसन भी कहा जाता है, संरक्षित वन्यजीवों की श्रेणी में आती है। इसका शिकार करना कानूनन गंभीर अपराध है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दोष सिद्ध होने पर कठोर सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। घटना के बाद विभाग ने तत्काल अपराध पंजीबद्ध कर विशेष टीम गठित की थी।

इस मामले को लेकर वन विभाग ने शुरू से ही सख्त रुख अपनाया। नियमित गश्त बढ़ाई गई, संदिग्ध इलाकों में निगरानी की गई और आसपास के गांवों में पूछताछ अभियान चलाया गया। कार्रवाई में प्रशिक्षु सहायक वन संरक्षक गुलशन कुमार साहू, प्रशिक्षु वन क्षेत्रपाल रुपेश्वरी दीवान और डब्बू साहू सहित अन्य कर्मचारियों ने सक्रिय भूमिका निभाई। टीम ने तकनीकी साक्ष्यों और स्थानीय सूचनाओं के आधार पर आरोपियों की पहचान सुनिश्चित की। वन अधिकारियों का कहना है कि वन्यजीव अपराधों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है। किसी भी आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा।

दो मुख्य आरोपियों के आत्मसमर्पण के बाद अब विभाग का फोकस शेष फरार आरोपियों पर है। उनके संभावित ठिकानों पर दबिश दी जा रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, जल्द ही बाकी आरोपियों की गिरफ्तारी की संभावना है। वन विभाग ने आसपास के जिलों को भी अलर्ट कर दिया है ताकि आरोपी सीमा पार न कर सकें। जरूरत पड़ने पर पुलिस की मदद भी ली जा रही है।

इस कार्रवाई को वन्यजीव संरक्षण की दिशा में अहम माना जा रहा है। हाल के वर्षों में अवैध शिकार की घटनाओं को लेकर चिंता बढ़ी है। ऐसे में इस मामले में त्वरित और सख्त कार्रवाई से स्पष्ट संदेश गया है कि संरक्षित प्रजातियों के खिलाफ अपराध करने वालों को कानून का सामना करना ही होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि मादा गौर जैसे बड़े शाकाहारी वन्यजीव जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके संरक्षण से जैव विविधता संतुलित रहती है।

इस घटना के बाद वन विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान भी चलाने की तैयारी में है। उद्देश्य यह है कि स्थानीय समुदाय वन्यजीव संरक्षण के महत्व को समझें और अवैध शिकार जैसी गतिविधियों से दूर रहें। अक्सर आर्थिक लालच या अज्ञानता के कारण लोग ऐसे अपराधों में शामिल हो जाते हैं। विभाग का मानना है कि सख्ती के साथ-साथ जागरूकता भी जरूरी है।

अब यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। आरोप सिद्ध होने पर संबंधित आरोपियों को कठोर दंड मिल सकता है। विभाग ने सभी साक्ष्य संकलित कर कानूनी प्रक्रिया को मजबूत बनाने पर जोर दिया है ताकि दोषियों को सजा सुनिश्चित हो सके।

वन परिक्षेत्र अर्जुनी में इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित किया है कि सतर्कता और निरंतर निगरानी से बड़े मामलों में भी सफलता मिल सकती है। विभाग की सघन कार्रवाई और लगातार दबाव के कारण ही फरार आरोपी आत्मसमर्पण करने को मजबूर हुए। हालांकि मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शेष आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही जांच पूर्ण मानी जाएगी।

वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि क्षेत्र में गश्त और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा। संवेदनशील इलाकों में विशेष निगरानी रखी जाएगी। साथ ही, मुखबिर तंत्र को और सक्रिय किया जा रहा है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सख्ती, तकनीकी निगरानी और सामुदायिक भागीदारी तीनों को समान महत्व दिया जा रहा है।
 

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