सब्जी बेचने से राष्ट्र ऋषि तक: नानाजी देशमुख, जिन्होंने ठुकराया मंत्री पद और बने आपातकाल के 'अंडरग्राउंड कमांडर'

यादों में नानाजी: नानाजी देशमुख बने थे जेपी की ढाल और आपातकाल का 'अंडरग्राउंड कमांडर'


नई दिल्ली, 26 फरवरी। कल्पना कीजिए एक ऐसे लड़के की, जिसके पास स्कूल की फीस भरने और किताबें खरीदने तक के भी पैसे नहीं थे। वह अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए कड़कड़ाती धूप में गलियों में सब्जियां बेचा करता था। किसे पता था कि सब्जी बेचने वाला यह साधारण सा लड़का एक दिन भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा रणनीतिकार बनेगा? कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि यह शख्स देश के प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए कैबिनेट मंत्री के पद को मुस्कुराते हुए ठुकरा देगा? यह कहानी है भारत के 'राष्ट्र ऋषि' चंडिकादास अमृतराव देशमुख की, जिन्हें दुनिया प्यार और सम्मान से 'नानाजी देशमुख' के नाम से जानती है।

11 अक्टूबर, 1916 को महाराष्ट्र के परभणी में जन्मे नानाजी देशमुख बचपन से ही बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित थे। जब वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के संपर्क में आए, तो उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया।

संघ ने जब उन्हें उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में काम करने के लिए भेजा, तो उनकी जेब खाली थी। संगठन के पास न पैसा था, न कोई ठिकाना। उन्हें रहने के लिए धर्मशालाओं का सहारा लेना पड़ा। लेकिन मुसीबत यह थी कि उस समय धर्मशाला के नियम के अनुसार कोई भी व्यक्ति तीन दिन से ज्यादा नहीं रुक सकता था। ऐसे में नानाजी देशमुख को हर तीसरे दिन अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर नई जगह तलाशनी पड़ती थी।

अंततः, प्रसिद्ध समाजसेवक बाबा राघवदास ने उन्हें अपने घर में इस शर्त पर पनाह दी कि नानाजी रोज उनके लिए खाना पकाया करेंगे। एक रसोइये और प्रचारक की दोहरी भूमिका निभाते हुए, इस युवा ने महज तीन साल के भीतर गोरखपुर और उसके आस-पास के इलाकों में संघ की 250 शाखाएं खड़ी कर दीं। यह उनके अदम्य साहस और जमीनी कौशल का पहला बड़ा प्रमाण था। नानाजी देशमुख का व्यक्तित्व ऐसा था कि घोर राजनीतिक विरोधी भी उनके मुरीद हो जाते थे। 1948 में जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा, तो नानाजी ने संगठन का काम गुप्त रूप से जारी रखा।

दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान उन्होंने अपना 'अंडरग्राउंड' नेटवर्क पंडित नेहरू की कैबिनेट के मंत्री और दिग्गज कांग्रेसी नेता रफी अहमद किदवई के घर से संचालित किया। एक धुर विरोधी नेता के घर में बैठकर अपनी रणनीति को अंजाम देना, यह केवल नानाजी देशमुख की कूटनीतिक समझ और व्यक्तिगत संबंधों की गहराई के कारण ही संभव था।

1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश पर 'आपातकाल' थोपा, तब भी नानाजी देशमुख गिरफ्तारी से बच निकले। कभी सरदारजी के भेष में, तो कभी मूंछें लगाकर एक व्यापारी के रूप में, वे पूरे देश में घूमते रहे और लोकतंत्र की बहाली के लिए एक जमीनी आंदोलन खड़ा कर दिया। 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान पटना में एक विशाल जन-प्रदर्शन हो रहा था। अचानक पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। पुलिस की लाठियां सीधे 70 पार कर चुके जयप्रकाश नारायण (जेपी) की तरफ आ रही थीं। उसी क्षण, नानाजी देशमुख एक ढाल बनकर जेपी के ऊपर लेट गए। पुलिस की बेरहम लाठियों से नानाजी की बांह की हड्डी टूट गई, लेकिन उन्होंने लोकतंत्र के उस महान नायक को खरोंच तक नहीं आने दी।

इस अदम्य साहस और उनके द्वारा बुने गए विपक्षी गठजोड़ ने 1977 में कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंका। जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी, तो नानाजी देशमुख को उद्योग मंत्रालय का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन नानाजी ने मंत्री पद ठुकरा दिया। और फिर 60 वर्ष की आयु में उन्होंने वह किया जो भारतीय राजनीति में अकल्पनीय है। उन्होंने सक्रिय राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास लेने की घोषणा कर दी। उनका मानना था कि 60 के बाद नेताओं को कुर्सी छोड़कर समाज सेवा करनी चाहिए।

उन्होंने 'दीनदयाल शोध संस्थान' (डीआरआई) के जरिए एक अनोखा मॉडल पेश किया। 'समाज शिल्पी दंपति' (एसएसडी), इसमें पढ़े-लिखे नवविवाहित जोड़ों को 5 साल के लिए गांवों में भेजा जाता था। जोड़ों को इसलिए चुना गया ताकि गांव की महिलाएं बिना किसी झिझक के महिला कार्यकर्ता से अपनी परेशानियां साझा कर सकें। इन जोड़ों ने आदिवासी इलाकों में अंधविश्वास मिटाए, कुपोषण खत्म किया और शिक्षा की नई अलख जगाई।

लेकिन 'विवाद-मुक्त ग्राम' सबसे बड़ी क्रांति थी। नानाजी देशमुख का मानना था कि मुकदमों में उलझा गांव कभी तरक्की नहीं कर सकता। उन्होंने महिलाओं और बुजुर्गों को जिम्मेदारी दी कि गांव का कोई भी झगड़ा पुलिस थाने या अदालत तक न जाए। फैसले चौपाल पर, आपसी सहमति से होने लगे।

यह मॉडल इतना सफल हुआ कि जब 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने चित्रकूट का दौरा किया, तो वे इन मुकदमों से आजाद गांवों को देखकर हैरान रह गए। उन्होंने देश भर के जजों के सामने 'चित्रकूट मॉडल' की मिसाल पेश की।

नानाजी देशमुख को भारत रत्न और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 27 फरवरी 2010 को 94 वर्ष की आयु में नानाजी देशमुख ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
 

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