करौली सरकार का बेबाक बयान: "हिंदू एकता के बल पर चले सरकार, देश-प्रदेश में समन्वय जरूरी"

प्रदेश से देश तक हिंदू एकता के बलबूते सरकारें: करौली शंकर महादेव


कानपुर, 22 फरवरी। करौली शंकर महादेव, जिन्हें करौली सरकार के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने यूजीसी से संबंधित मुद्दे पर कहा कि अगर इससे जनता में असंतोष पैदा हुआ है, तो सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए। अगर सरकार ने कोई नियम कानून बनाया है, तो उसके पीछे कोई कारण जरूर होगा।

करौली सरकार ने आईएएनएस से बात करते हुए शंकराचार्य मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी और संवाद व शांति का आग्रह किया और कहा, "राम भद्राचार्य जी एक बहुत ही विद्वान संत हैं, और मैं उनके कथन से सहमत हूं। बच्चों में कोई मतभेद नहीं आना चाहिए; यदि शिक्षा के दौरान मतभेद होते हैं, तो भविष्य में जीवन यापन करने में कठिनाइयां आएंगी।

ये तो जो लोग राजगद्दी पर बैठे हुए लोग हैं, उन्हें सोचना है। उन्हीं को तय करना है कि कैसे इसके आपस में सामंजस्य बैठाना है। मुझे लगता है कि सरकार भी इसी सोच की है कि एकता हो, हिंदू समाज में समस्तता हो, और इस प्रकार के जो एक्ट हों या अव्यवस्था हो, जो समाज में प्रधान पैदा करती है, वो नहीं होना चाहिए।"

उन्होंने कहा, "ये मामला जो है, जहां तक हमारे संज्ञान में है, हमें तो साफ-साफ दिखता है कि जो धर्म गद्दी है, राजगद्दी है, उसके बीच भी कुछ मतभेद होंगे और हो सकते हैं। ये मतभेद दूर हो जाएंगे; मुझे लगता नहीं कि किसी प्रकार से कोई द्वेष वश आपस में ज्यादा दिन नहीं, क्योंकि दोनों ही तरफ द्रोणाचार्य हैं। समझदारी से बातें रखने वाले लोग हैं, तो ये चीजें बहुत जल्दी समाप्त हो जाएंगी। यह बहुत बड़ा विषय नहीं है, समाप्त हो जाएगा।"

उन्होंने आगे कहा, "सनातन में कभी कोई लड़ाई नहीं चल सकती है। मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं, और ये पौराणिक काल से होता रहा है, चलता आ रहा है। हमारे प्रधानमंत्री ने कई ऐसे अयोग्य कानून नष्ट किए, जिनकी कोई आवश्यकता नहीं थी। हमें लगता है कि वो इसपर भी विचार करेंगे। जब इतने बड़े-बड़े धर्माचार्य भी उसपर अपना पक्ष रख रहे हैं, तो आवश्यक है कि उसपर विचार किया जाना चाहिए।"

महाराज ने बताया, "प्रदेश की सरकार हो या देश की सरकार, सब हिंदूओं की एकता से बनी हुई सरकार है और यह एकता कायम रहनी चाहिए। किसी भी रूप में हिंदू संस्कृति जो है, वह मजबूत रहनी चाहिए। उस पर कोई खटास नहीं आनी चाहिए।

अगर सरकार ने किसी बिल को लाया है, तो उसके पीछे उनकी कोई सोच होगी। ये जो दबे-कुचले लोग हैं, उनको दबाया न जाए, उनका शोषण और उत्पीड़न न हो, इस सोच से लाए होंगे, लेकिन सरकार को इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरा जो पक्ष है, उनका भी उत्पीड़न किसी कानून की आड़ में न हो।"
 

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