आसमान का अद्भुत नज़ारा: रात में भी चमकते रहस्यमयी नॉक्टिलुसेंट क्लाउड, जो सूरज ढलने के बाद बिखेरते हैं रोशनी

रात में चमकते रहस्यमयी 'नॉक्टिलुसेंट क्लाउड', सूरज डूबने के बाद भी बिखेरते हैं रोशनी


नई दिल्ली, 22 फरवरी। विज्ञान की दुनिया अनगिनत रहस्यों से भरी हुई है, जो उत्सुकता जगाते हैं और कई बार हैरान भी कर देते हैं। इनमें से एक खास रहस्य है नॉक्टिलुसेंट क्लाउड, जिसे 'रात में चमकने वाले बादल' भी कहा जाता है। ये बादल सामान्य बादलों से बिल्कुल अलग होते हैं और रात के अंधेरे में भी चमक बिखेरते दिखाई देते हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा इनके बारे में विस्तार से जानकारी देती है।

नॉक्टिलुसेंट क्लाउड ऊपरी वायुमंडल में बर्फ के छोटे क्रिस्टल से बनते हैं और सूरज डूबने के बाद भी रोशनी को परावर्तित करके चमक पैदा करते हैं। यह पृथ्वी के वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत में बनने वाली अनोखी और रहस्यमयी घटना हैं। ये बादल सामान्य बादलों से बहुत अलग हैं क्योंकि ये लगभग 50 से 86 किलोमीटर (30 से 54 मील) की ऊंचाई पर मेसोस्फीयर में बनते हैं, जो पृथ्वी की सतह से बहुत दूर है। इनका नाम लैटिन शब्द "नॉक्टिलुसेंट" से आया है, जिसका मतलब है 'रात में चमकना'।

नासा के अनुसार, ये बादल बर्फ के बहुत छोटे क्रिस्टल या पानी के वाष्प से बनते हैं। ये क्रिस्टल सूरज की रोशनी को परावर्तित करते हैं, इसलिए सूरज डूबने के बाद भी ये चमकते दिखाई देते हैं। दिन में ये बहुत धुंधले होते हैं और दिखाई नहीं देते, लेकिन शाम के समय, जब नीचे का वायुमंडल अंधेरे में होता है लेकिन ऊपरी परत अभी भी सूरज की रोशनी में होती है, तब ये इंद्रधनुषी नीले-चांदी रंग के चमकते हुए दिखते हैं। ये मुख्य रूप से गर्मियों के महीनों में हाई लैटिट्यूड पर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्रों के पास दिखाई देते हैं।

ये बादल लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए पहेली बने हुए थे। नासा के एरोनॉमी ऑफ आइस न दी मेसोस्फीयर (एआईएम) मिशन ने साल 2007 में इनकी पहली स्टडी शुरू की। एआईएम दुनिया का पहला सैटेलाइट था, जो खास तौर पर इन बादलों का अध्ययन करने के लिए डिजाइन किया गया था। 11 जून 2007 को एआईएम ने उत्तरी गोलार्ध में इन बादलों का पहला पूरा दृश्य कैप्चर किया, जिसमें लगभग 5 किलोमीटर रिजॉल्यूशन था।

एआईएम के शुरुआती ऑब्जर्वेशन से पता चला कि ये बादल रोजाना दिखाई देते हैं, दूर-दूर तक फैले होते हैं और हर घंटे से लेकर दिन तक बदलते रहते हैं। उनकी चमक 3 किलोमीटर के स्केल पर बदलती है। वैज्ञानिकों को आश्चर्य हुआ कि मेसोस्फीयर में बर्फ की एक सिंगल, लगातार लेयर 82 से 89 किलोमीटर ऊपर फैली होती है।

साल 2007 के अंत तक एआईएम ने उत्तरी गोलार्ध में इन बादलों के पूरे लाइफ सर्कल को रिकॉर्ड किया - ये लगभग 25 मई से शुरू होकर अगस्त के अंत तक रहते हैं। पिछले दो दशकों में ये बादल और ज्यादा चमकदार हो गए हैं और कम अक्षांशों, यानी निचले लैटिट्यूड पर भी दिखाई देने लगे हैं।

हाल के अध्ययनों से यह भी पता चला है कि बढ़ते मीथेन उत्सर्जन से मेसोस्फीयर में अतिरिक्त जल वाष्प बनता है, जो इन बादलों को मजबूत बनाता है।
 
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