मक्का से दिल्ली तक: मौलाना आजाद की गाथा, स्वतंत्रता के नायक और भारत की शिक्षा के दूरदर्शी शिल्पकार

मौलाना अबुल कलाम आजाद: स्वतंत्रता सेनानी से शिक्षा मंत्री तक, एकता और ज्ञान के प्रतीक


नई दिल्ली, 21 फरवरी। मौलाना अबुल कलाम आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे महानायक थे, जिन्होंने न सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की, बल्कि आजादी के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा दी। मक्का में जन्मे अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद 'आजाद' ने अपनी उदार विचारधारा और बहुभाषी प्रतिभा से लाखों दिलों को जोड़ा।

आजाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का (सऊदी अरब) में हुआ था। उनका पूरा नाम अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद था, लेकिन वे 'आजाद' उपनाम से प्रसिद्ध हुए, जो उनकी उदार और स्वतंत्र विचारधारा का प्रतीक था। उनके पिता मौलाना मोहम्मद खैरुद्दीन अफगान मूल के विद्वान थे, जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे।

1857 की क्रांति के बाद परिवार मक्का चला गया था। वहां उनकी मां अरबी मूल की थीं। 1890 के आसपास परिवार कलकत्ता (कोलकाता) लौटा। दुर्भाग्य से मौलाना आजाद की मां का निधन तब हुआ जब वे मात्र 11 वर्ष के थे। उन्होंने कभी कोई औपचारिक स्कूल या विश्वविद्यालय नहीं पढ़ा। घर पर पिता और अन्य विद्वानों से इस्लामी शिक्षा, इतिहास, गणित, उर्दू, फारसी, अरबी, हिंदी और अंग्रेजी सीखी। उनकी बहुभाषी प्रतिभा और वाक्पटुता ने उन्हें 'अबुल कलाम' (संवादों का स्वामी) का खिताब दिलाया।

युवावस्था में ही मौलाना आजाद ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठाई। 1912 में उन्होंने उर्दू में साप्ताहिक पत्रिका 'अल-हिलाल' शुरू की, जो राष्ट्रवादी विचारों और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रचार करती थी। इस पत्रिका ने मॉर्ले-मिंटो सुधारों के बाद पैदा हुए साम्प्रदायिक तनाव को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई। 1914 में ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद उन्होंने 'अल-बलाग' शुरू की, लेकिन वह भी बंद कर दी गई। इन पत्रिकाओं ने उन्हें जेल भेजा, लेकिन उनकी राष्ट्रभक्ति अटल रही।

वे खिलाफत आंदोलन में सक्रिय रहे और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के मजबूत समर्थक बने। 1920 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। 1923 में मात्र 35 वर्ष की उम्र में वे कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने। 1940 से 1946 तक वे लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे। वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। मुहम्मद अली जिन्ना और दो-राष्ट्र सिद्धांत का उन्होंने जमकर विरोध किया। उन्होंने कहा था कि भारत हिंदू और मुस्लिम का साझा घर है, बंटवारा देश की कमजोरी होगा। गांधीजी उन्हें 'ज्ञान सम्राट' कहते थे।

आजादी के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने (1947-1958)। उन्होंने शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाने का सपना देखा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की स्थापना, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की शुरुआत और माध्यमिक शिक्षा आयोग जैसे कदम उनके दूरदर्शी प्रयास थे। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने और तकनीकी शिक्षा पर जोर दिया। उनकी किताबें, जैसे 'भारत विभाजन की कहानी', ऐतिहासिक महत्व की हैं, जिसमें उन्होंने विभाजन की पृष्ठभूमि को निष्पक्षता से लिखा।

मौलाना आजाद एक महान विद्वान, कवि, लेखक और विचारक थे। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। 22 फरवरी 1958 को दिल्ली में उनका निधन हो गया। मरणोपरांत 1992 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनकी जयंती 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाई जाती है।

मौलाना अबुल कलाम आजाद का जीवन हमें सिखाता है कि शिक्षा और एकता से ही राष्ट्र मजबूत होता है। वे एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने न केवल आजादी की लड़ाई लड़ी, बल्कि आजादी के बाद भी देश को शिक्षित और समृद्ध बनाने का संकल्प लिया। उनका योगदान आज भी प्रेरणा स्रोत है।
 

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