गांधीजी की परछाईं नहीं, कस्तूरबा: अशिक्षित बालिका से 'बा' तक, अंग्रेजी राज के लिए थीं गांधी-सी चुनौती

पोरबंदर की अशिक्षित बालिका से राष्ट्र की 'बा' तक का सफर, अंग्रेजी हुकूमत के लिए गांधीजी जितना ही 'बड़ा खतरा' थीं कस्तूरबा


नई दिल्ली, 21 फरवरी। इतिहास के पन्नों में कस्तूरबा गांधी को अक्सर महात्मा गांधी की 'परछाईं' मात्र मान लिया जाता है, लेकिन गहराई में उतरें तो सच यह है कि वह एक स्वतंत्र, निडर और बेहद मजबूत इरादों वाली जननेता थीं। 19वीं सदी के अंत में पोरबंदर की एक अशिक्षित बालिका से पूरे राष्ट्र की 'बा' बनने का सफर अद्भुत और प्रेरणादायक है।

11 अप्रैल 1869 को गुजरात के पोरबंदर में एक बेहद संपन्न व्यापारी गोकुलदास कपाड़िया के घर कस्तूरबा का जन्म हुआ था। उस दौर के रूढ़िवादी गुजराती समाज में लड़कियों की शिक्षा को न सिर्फ गैर-जरूरी माना जाता था, बल्कि उसे सामाजिक नियमों के खिलाफ देखा जाता था। इसी के चलते, महज 7 साल की उम्र में करमचंद गांधी के बेटे मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) के साथ उनकी सगाई कर दी गई और 13 साल की अल्पायु में उनका विवाह हो गया।

शुरुआती वैवाहिक जीवन उथल-पुथल भरा था। युवा मोहनदास एक अधिकार जताने वाले पति थे, जो चाहते थे कि कस्तूरबा उनकी हर बात आंख मूंदकर मानें और उन्हीं के सांचे में ढल जाएं। मोहनदास उन्हें साक्षर भी बनाना चाहते थे, लेकिन कस्तूरबा की अपनी एक स्वतंत्र सोच थी। दिन भर के भारी घरेलू काम से थकने के बाद जब मोहनदास उन्हें रात में पढ़ाने की कोशिश करते, तो वे अक्सर मौन रहकर अपना विरोध दर्ज करातीं।

दिलचस्प बात यह है कि दुनिया की बड़ी-बड़ी हुकूमतों को हिला देने वाले 'सत्याग्रह' और 'अहिंसा' का जन्म किसी राजनीतिक मंच या पुस्तकालय में नहीं, बल्कि गांधी जी के अपने घर में हुआ था। नवविवाहित मोहनदास ने बिना अनुमति घर से निकलने पर पाबंदी लगाई थी। वहीं दूसरी ओर, सास का आदेश टालना पाप था। ऐसे में जब सास उन्हें मंदिर जाने को कहतीं, तो कस्तूरबा पति की अनुमति लिए बिना (दिन में पति-पत्नी का संवाद वर्जित था) शांति से मंदिर चली जाती थीं। मोहनदास के क्रोधित होने पर वे अत्यंत तर्क और शांति से अपना पक्ष रखतीं। उनका यह शांतिपूर्ण, लेकिन दृढ़ प्रतिरोध इतना प्रभावशाली था कि खुद गांधी जी को अपनी पाबंदियां हटानी पड़ीं। गांधी जी ने स्वयं स्वीकारा था, "मैंने अहिंसा का पाठ अपनी पत्नी से सीखा... उसके दृढ़ प्रतिरोध ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि मैं उस पर शासन करने के लिए पैदा नहीं हुआ हूं।"

1897 में कस्तूरबा अपने पति के पास दक्षिण अफ्रीका गईं। यही वह कालखंड था जिसने उन्हें एक पारंपरिक हिंदू पत्नी से निकालकर एक निडर राजनीतिक कार्यकर्ता बना दिया। वहां के घोर नस्लीय भेदभाव और अमानवीय अन्याय ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया।

1904 में जोहान्सबर्ग की भारतीय बस्ती में भयानक 'ब्यूबोनिक प्लेग' फैल गया। कस्तूरबा गांधी ने अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों के बीच जाकर उन्हें स्वच्छता और रोकथाम के प्रति जागरूक किया। 1904 में ही गांधी जी ने डर्बन के पास 'फीनिक्स सेटलमेंट' की स्थापना की। जब गांधी जी जेल गए तो कस्तूरबा ने इस आश्रम की 'कुलमाता' का दायित्व संभाला। पति से एकजुटता दिखाते हुए उन्होंने जेल में मिलने वाला वही सादा और उबला हुआ भोजन खाना शुरू कर दिया, जो गांधी जी को दिया जा रहा था। 23 सितंबर 1913 को खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने 16 सत्याग्रहियों के पहले जत्थे का नेतृत्व करते हुए ट्रांसवाल की सीमा पार की। उन्हें गिरफ्तार कर 3 महीने के कठोर कारावास की सजा दी गई।

1914 में भारत लौटने के बाद कस्तूरबा ने साबरमती और सेवाग्राम आश्रमों की कमान संभाल ली। यहीं उन्हें 'बा' नाम मिला, जिससे वे हमेशा के लिए अमर हो गईं। आश्रम में आने वाले हर राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी और आम कार्यकर्ता के लिए वह एक ढाल और समझदार मित्र थीं। 1917 के चंपारण सत्याग्रह के दौरान, जब गांधी जी किसानों की लड़ाई लड़ रहे थे, तब कस्तूरबा ने गांव-गांव जाकर महिलाओं के बीच स्वच्छता और शिक्षा का अभियान चलाया।

अगर आपको लगता है कि कस्तूरबा सिर्फ पर्दे के पीछे रहकर समर्थन करती थीं, तो इतिहास के पन्ने कुछ और ही गवाही देते हैं। जब गांधीजी 6 साल के लिए जेल में थे, तब कस्तूरबा ने पूरे देश का दौरा कर स्वतंत्रता की लौ जलाए रखी। 1923 के बोरसद सत्याग्रह में पुलिस द्वारा महिलाओं पर किए गए बर्बर अत्याचार के खिलाफ उन्होंने एक ऐसा ओजस्वी प्रेस वक्तव्य दिया जिसने पूरे देश को जगा दिया।

दांडी मार्च के समय पहले महिलाओं को संगठित करने और बाद में समुद्र तट पर जाकर नमक कानून तोड़ने का नेतृत्व कस्तूरबा ने स्वयं किया, जिसके लिए उन्हें जेल भेजा गया।

राजकोट सत्याग्रह के दौरान कस्तूरबा गांधी के प्रभाव से ब्रिटिश सरकार इतनी खौफजदा थी कि 70 साल की उम्र में उन्हें एकांत कारावास में डाल दिया गया। जेल में दुर्व्यवहार के खिलाफ उन्होंने तब तक उपवास रखा जब तक प्रशासन झुक नहीं गया। 1933 तक ब्रिटिश हुकूमत आधिकारिक तौर पर कस्तूरबा को कानून और व्यवस्था के लिए गांधी जी के बराबर ही 'बड़ा खतरा' मानने लगी थी।

22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
 

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