केरल कांग्रेस को करारा झटका, छह बार के विधायक के. बाबू ने चुनाव से पहले छोड़ी सियासत की राह

केरल में कांग्रेस को लगा बड़ा झटका, छह बार के विधायक के. बाबू ने की राजनीति से संन्यास की घोषणा


कोच्चि, 19 फरवरी। केरल विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के. बाबू ने गुरुवार को राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी, जिससे उनके लंबे और घटनापूर्ण विधायी करियर का अंत हो गया।

त्रिपुनिथुरा से छह बार के विधायक के. बाबू ने कहा कि उन्होंने अपने फैसले की जानकारी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दे दी है, जबकि कांग्रेस नेतृत्व ने कथित तौर पर उनसे उस निर्वाचन क्षेत्र से एक बार फिर चुनाव लड़ने के लिए कहा है।

के. बाबू ने कहा, "मैंने अपने सभी वरिष्ठ पार्टी नेताओं को सूचित कर दिया है कि मैं अब चुनावी राजनीति का हिस्सा नहीं रहूंगा।"

अपनी संगठनात्मक कुशलता के लिए जाने जाने वाले 74 वर्षीय मृदुभाषी नेता के. बाबू ने पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के सबसे विश्वासपात्रों में से एक थे। उन्होंने 2011 से 2016 के बीच चांडी के नेतृत्व वाली सरकार में आबकारी मंत्री के रूप में कार्य किया, एक ऐसा कार्यकाल जो बाद में बार लाइसेंस घोटाले विवाद से प्रभावित हुआ।

सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों ने के. बाबू को विधानसभा के अंदर और बाहर दोनों जगह तीव्र राजनीतिक दबाव में डाल दिया। 2016 से उन्हें सतर्कता और भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो द्वारा जांच का सामना करना पड़ा, जो उनके सार्वजनिक जीवन में एक उथल-पुथल भरे दौर की शुरुआत थी।

लंबी जांच और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं ने व्यक्तिगत रूप से काफी कष्ट पहुंचाया। तमाम असफलताओं के बावजूद के. बाबू ने 2021 में चुनावी मैदान में यह कहते हुए फिर से उतरने का फैसला किया कि वह मतदाताओं का सामना करना चाहते हैं और अपना नाम साफ करना चाहते हैं।

एक बेहद चर्चित मुकाबले में, उन्होंने त्रिपुनिथुरा सीट पर फिर से कब्जा कर लिया और सीपीआई (एम) नेता एम. स्वराज को हराया, जिन्होंने उन्हें 2016 में हराया था। अब उनके चुनाव से हटने के फैसले से एर्नाकुलम जिले में कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण गढ़ खुल गया है, ऐसे समय में जब उम्मीदवारों का चयन गहन चर्चा के केंद्र में है।

दशकों के विधायी अनुभव और त्रिपुनिथुरा में गहरी जड़ों वाले के. बाबू का जाना इस निर्वाचन क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में एक युग के अंत का प्रतीक है और आगामी चुनावी लड़ाई की तैयारी के बीच पार्टी के भीतर एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है।
 

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