फिदेल कास्त्रो: क्यूबा की खातिर जब क्रांतिवीर ने छोड़ी सत्ता, आधी सदी तक बदला देश और दुनिया का समीकरण

Fidel Castro


नई दिल्ली, 18 फरवरी। जब फिदेल कास्त्रो ने 19 फरवरी 2008 को औपचारिक रूप से सत्ता छोड़ने की घोषणा की, तो यह सिर्फ एक पदत्याग नहीं था, बल्कि लगभग आधी सदी लंबे एक राजनीतिक युग का अंत था। 1959 की क्यूबा क्रांति के बाद उभरे इस नेता ने न केवल अपने देश की दिशा बदली, बल्कि शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति में भी एक केंद्रीय भूमिका निभाई। आज जब क्यूबा मुश्किल दौर से गुजर रहा है तो फिदेल की विरासत याद आ जाती है। विरासत जिसमें लड़ने का जुनून और बड़े बड़ों से लोहा लेने का दम था।

कास्त्रो ने अमेरिकी समर्थित शासन को हटाकर एक दलीय समाजवादी (कम्युनिस्ट) व्यवस्था स्थापित की। सोवियत संघ के साथ उनकी नजदीकी और अमेरिका के साथ तल्ख रिश्तों ने क्यूबा को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। 1962 का क्यूबा मिसाइल संकट शीत युद्ध के सबसे तनावपूर्ण क्षणों में से एक बना, जिसने दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया। कास्त्रो की छवि एक ऐसे नेता की रही जो अमेरिकी दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं था। गुरिल्ला युद्ध में माहिर ये नेता बड़े गर्व से कहता था कि दुनिया का सबसे सुरक्षित देश क्यूबा है।

देश के भीतर उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में व्यापक सुधार किए। क्यूबा की साक्षरता दर और प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली को अक्सर उनकी उपलब्धियों के रूप में गिनाया जाता है। दूसरी ओर, आलोचक उनके शासन को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश और राजनीतिक विरोध के दमन के लिए याद करते हैं। यही द्वंद्व उनकी विरासत को जटिल बनाता है।

स्वास्थ्य कारणों से 2006 में उन्होंने अस्थायी रूप से सत्ता अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंपी और 2008 में औपचारिक रूप से पद छोड़ दिया। इसके बाद क्यूबा में सीमित आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई। निजी छोटे व्यवसायों को कुछ छूट मिली और विदेश निवेश के लिए अवसर खोले गए। फिदेल का रसूख बरसों बरस कायम रहा, लेकिन फिर इसमें गिरावट आना भी लाजिमी ही था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 2014 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ संबंध सुधार की ऐतिहासिक पहल हुई। हालांकि बाद में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में कई प्रतिबंध फिर से कड़े कर दिए गए। इन उतार-चढ़ावों ने क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला।

आज क्यूबा, राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कैनेल के नेतृत्व में, आर्थिक चुनौतियों, महंगाई और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। सरकार सीमित बाजार सुधारों के माध्यम से स्थिरता लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन राजनीतिक ढांचा अब भी एकदलीय है। विचारधारा में परिवर्तन हुआ है, लेकिन देश में सुधार नहीं दिख रहा है। वह कास्त्रो को याद कर रहा है जिसने सत्ता और प्रतिरोध की कहानी गढ़ी और लातिन अमेरिकी देश क्यूबा को वैश्विक मानचित्र पर अलग पहचान दिलाई।
 

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