मोहन भागवत का मंत्र: 'हम सब हिंदू हैं' का संकल्प मिटाएगा जातिवाद, तभी मजबूत होगी राष्ट्र की एकता

हम सब हिंदू हैं’ की बड़ी लकीर खींचें, जाति दीवारें मिटेंगी: मोहन भागवत


लखनऊ, 18 फरवरी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सामाजिक समरसता, जाति उन्मूलन और सांस्कृतिक एकता को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार बताते हुए कहा कि हम सब भारत माता के पुत्र हैं, सहोदर हैं, और हम हिंदू हैं। यही भाव अस्पृश्यता और जातीय विभाजन को समाप्त करेगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिकता का विरोध नहीं, बल्कि अंधानुकरण का विरोध है। समाज यदि जागृत और समरस रहेगा तो राजनीतिक विकृतियां स्वतः समाप्त होंगी। मोहन भागवत ने बुधवार को लखनऊ में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जाति कोई शाश्वत व्यवस्था नहीं, बल्कि वर्तमान समय में अव्यवस्था का रूप ले चुकी है। पहले यह कार्य-आधारित थी, अब हर व्यक्ति हर कार्य कर सकता है। जाति की दीवारें मिट रही हैं, तरुण वर्ग का व्यवहार बदल रहा है। हमें समाज को समरस बनाए रखने की बड़ी लकीर खींचनी है- हम सब हिंदू हैं।

उन्होंने यूजीसी रेगुलेशन के मुद्दे पर कहा कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए पूर्वानुमान आधारित प्रतिक्रिया उचित नहीं। समाज में विभाजन न हो, यह ध्यान रखना आवश्यक है। भागवत ने कहा कि आधुनिकीकरण एक सतत प्रक्रिया है, उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए, परंतु पश्चिमीकरण के अंधानुकरण से बचना जरूरी है। जो नया है, उसे परख कर स्वीकार करें। शाश्वत मूल्यों के अनुरूप परिवर्तन ही उचित है।

मोहन भागवत ने संयुक्त परिवारों के घटने पर चिंता जताते हुए कहा कि संबंधों का भाव बना रहना चाहिए। सब कुछ बदले, पर अपनापन न बदले। उन्होंने कहा कि उसका अनुशासित उपयोग जरूरी है। स्क्रीन टाइम तय करें, बच्चों को दिशा दें। 12 वर्ष तक शील का निर्माण होता है। घर का आचरण ठीक रहेगा तो पीढ़ी भी सही दिशा में जाएगी।

जातीय विद्वेष और राजनीतिक आह्वानों पर उन्होंने कहा कि बिना सामाजिक सद्भाव के राजनीतिक शुद्धिकरण संभव नहीं है। नेता सामाजिक उपकरण हैं। जैसे समाज होगा, वैसे ही नेता होंगे। समाज जागृत रहेगा तो राजनीति स्वतः सुधरेगी। उन्होंने कहा कि भारत बहुसांस्कृतिक समाज नहीं, बल्कि एक संस्कृति का वैविध्यपूर्ण समाज है। भाषा, वेशभूषा और खानपान में भिन्नता के बावजूद मूल सांस्कृतिक भाव एक है।

संघ प्रमुख ने वैश्विक ‘टैरिफ वॉर’ पर कहा कि इसका भारत पर सीमित असर होगा। भारत ‘मास प्रोडक्शन’ नहीं, बल्कि ‘प्रोडक्शन बाय मासेज’ की नीति का पक्षधर है। संपत्ति का न्यायपूर्ण वितरण और नैतिक विकास के साथ ही विकसित भारत संभव है। महिलाओं की भूमिका पर उन्होंने कहा कि संघ में उनकी भूमिका सीमित नहीं है। उन्होंने राष्ट्र सेविका समिति का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं के उन्नयन में महिला शक्ति ही प्रमुख भूमिका निभाती है।

उन्होंने बताया कि हजारों गांवों में व्यसन मुक्ति, स्वावलंबन और जल संरक्षण जैसे प्रयास चल रहे हैं। उन्होंने धर्म शिक्षा पर कहा कि यह घर से शुरू होनी चाहिए, विद्यालय मूल्यों की शिक्षा दें और घर में परंपरा का संस्कार हो। भागवत ने कहा कि मंदिरों का संचालन भक्तों और समाज के प्रतिष्ठित जनों के हाथ में होना चाहिए, ताकि वे समाजोपयोगी गतिविधियों का केंद्र बन सकें। उन्होंने कहा कि देश की सबसे बड़ी शक्ति हिंदू समाज है। वह संगठित और जागृत हो जाए तो भारत को नैतिक और आर्थिक रूप से विकसित राष्ट्र बनाने से कोई नहीं रोक सकता।
 

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