सिर्फ़ मुर्दाख़ोर नहीं, जंगल का शातिर शिकारी है सियार! इकोसिस्टम में इसकी अहमियत जानकर चौंक जाएंगे आप

सियार: जंगल का चतुर शिकारी, इकोसिस्टम में अहम भूमिका, ताकत से ज्यादा लगाता है दिमाग


नई दिल्ली, 18 फरवरी। जंगल का सबसे चतुर और सतर्क शिकारी माना जाने वाला सियार (जैकल) भारतीय वन्यजीवों में अपनी अनुकूलन क्षमता और चालाकी के लिए प्रसिद्ध है। यह मध्यम आकार का कैनिड (कुत्ते परिवार का सदस्य) भारत में सबसे आम जंगली कुत्ते जैसा जानवर है।

सियार का शरीर 60 से 75 सेंटीमीटर लंबा होता है और वजन 7 से 15 किलोग्राम तक रहता है। इसका रंग हल्का भूरा-गोल्डन होता है, जिसमें पेट, गला और आंखों के आसपास सफेद बाल होते हैं। उत्तरी भारत के सियार दक्षिण भारत के मुकाबले थोड़े बड़े और भारी होते हैं। इसकी पूंछ छोटी और घनी होती है, जिसके सिरे पर काला या भूरा रंग होता है। लंबे पतले पैरों और छोटे फुट पैड के कारण इसकी चाल हल्की और फुर्तीली रहती है। सर्दियों में इसका रंग गहरा पीला हो जाता है।

सियार को अक्सर केवल मृतभक्षी (स्कैवेंजर) समझ लिया जाता है, लेकिन यह एक कुशल शिकारी भी है। यह चूहे, खरगोश, पक्षी, छोटे स्तनधारी और यहां तक कि बिना रीढ़ वाले जीवों का शिकार करता है।

मौसम और स्थान के अनुसार इसका आहार बदलता रहता है। यह फल, सब्जियां, कीड़े और कूड़े में फेंका हुआ खाना भी खाता है। यही नहीं, यह झुंड में मिलकर बड़े शिकार करने की क्षमता भी रखता है। इकोसिस्टम में मृत जानवरों की सफाई करके और छोटे जीवों का शिकार करके यह संतुलन बनाए रखता है।

सियार 4 से 5 सदस्यों के छोटे झुंड में रहते हैं। झुंड में सामाजिक ढांचा मजबूत होता है। पिल्लों की देखभाल, शिकार और क्षेत्र की रक्षा सब मिलकर करते हैं। सियार लंबे समय तक जोड़े बनाकर रह सकते हैं। मादा एक बार में 1 से 9 पिल्लों को जन्म देती है। दोनों बराबर जिम्मेदारी निभाते हैं। यह जानवर मुख्य रूप से निशाचर होता है, लेकिन अनुकूलन क्षमता के कारण दिन में भी सक्रिय रह सकता है।

सियार कई आवाजें निकालते हैं, जैसे हाउलिंग, भौंकना और चेतावनी की आवाजें। एक की हाउलिंग पर आसपास के सियार जवाब देते हैं। भारत में सियार लगभग हर जगह पाए जाते हैं, जंगल, घास के मैदान, मैंग्रोव, अर्ध-रेगिस्तानी इलाके, खेती वाली जमीन, ग्रामीण और यहां तक कि शहरी इलाकों में भी पाए जाते हैं।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत यह अनुसूची-2 में संरक्षित है। भारत सरकार और राज्य वन विभाग मानव-सियार संघर्ष कम करने, संरक्षण और पुनर्वास के लिए काम करते हैं। तेज शहरीकरण और जंगलों के कटने से सियार अब शहरों में भी दिखने लगे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं।

रोचक बात है कि दुनिया भर में सियार की छवि अलग-अलग है। भारतीय लोककथाओं में इसे चालाक बताया जाता है, अफ्रीकी कहानियों में धोखेबाज, बाइबिल में अकेलेपन का प्रतीक और मिस्र में एक देवता के रूप में पूजा जाता है।

दुनिया भर में सियार की तीन मुख्य प्रजातियां हैं, गोल्डन जैकल, ब्लैक-बैक्ड जैकल और साइड-स्ट्राइप्ड जैकल। जेनेटिक अध्ययन से पता चला है कि अफ्रीका का गोल्डन जैकल ग्रे वुल्फ और कोयोट से ज्यादा करीब है। सियार जंगल के सतर्क और शातिर शिकारी हैं। इसमें चतुराई, अनुकूलन क्षमता और सामाजिक व्यवहार पाया जाता है।
 

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