नव केरल सर्वे पर HC का कड़ा प्रहार: माकपा-सरकार को फटकार, 'पार्टी को पहले कैसे जानकारी मिली?' लगाई रोक

केरल हाई कोर्ट ने ‘नव केरल सर्वे’ पर लगाई रोक, माकपा और राज्य सरकार को लगाई फटकार


कोच्चि, 17 फरवरी। केरल हाईकोर्ट ने ‘नव केरल सर्वे’ पर रोक लगाते हुए सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) और राज्य सरकार के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि सर्वे को लेकर गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितताएं सामने आई हैं।

डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि पार्टी को सर्वे के बारे में पहले से जानकारी थी। कोर्ट ने सवाल उठाया कि सरकार के औपचारिक आदेश से पहले पार्टी को इस निर्णय की जानकारी कैसे मिल गई। इस संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

अदालत ने पाया कि 8 अक्टूबर 2025 को राज्य कैबिनेट द्वारा सर्वे का निर्णय लेने से पहले ही पार्टी सचिव की ओर से कार्यकर्ताओं को पोर्टल पर पंजीकरण करने के लिए पत्र भेजा गया था। याचिकाकर्ताओं ने यह पत्र अदालत में पेश किया।

कोर्ट ने कहा कि इस पत्र को हल्के में नहीं लिया जा सकता और इससे यह संदेह पैदा होता है कि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को सर्वे प्रक्रिया में गुपचुप तरीके से शामिल करना चाहती थी।

सीपीआई (एम) के राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन को भी मामले में प्रतिवादी बनाया गया था। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच ने उनके हलफनामे को असंतोषजनक बताया।

हाईकोर्ट ने ‘विशेष पीआर अभियान’ के नाम पर 20 करोड़ रुपये की मंजूरी को नियमों के उल्लंघन का मामला मानते हुए कहा कि धन आवंटन की प्रक्रिया ही नियमों के विपरीत थी। अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी खर्च पर ऐसे सर्वे के लिए वित्त विभाग की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य थी, जो नहीं ली गई।

कोर्ट ने इसे वित्तीय मानकों से विचलन करार दिया और सर्वे की कार्यप्रणाली पर भी संदेह जताया। सर्वे 22 फरवरी तक चलने वाला था, लेकिन अदालत ने इसे अवैध ठहराते हुए तत्काल प्रभाव से रोक दिया।

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने ‘नव केरल सर्वे’ को सरकार की विकास और कल्याण योजनाओं पर जनता की राय जानने का कार्यक्रम बताया था। लेकिन विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण अदालत के इस फैसले को सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

यह याचिका केएसयू के राज्य अध्यक्ष अलोयसियस जेवियर और कांग्रेस के एर्नाकुलम जिला पंचायत सदस्य मुबास ओनक्काली ने दायर की थी। उनका आरोप था कि सरकारी धन से कराया जा रहा यह सर्वे वास्तव में चुनाव से पहले सीपीआई (एम) के लिए डाटा जुटाने का माध्यम था और सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया जा रहा था।
 
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