क्या सपनों की नगरी मुंबई सिनेमा के लिए थक गई? निर्देशक रवि उदयवार बोले: अब शहर में नया दिखाना मुश्किल!

निर्देशक रवि उदयवार का बड़ा बयान, मुंबई अब फिल्मकारों के लिए थक चुकी है


मुंबई, 16 फरवरी। फिल्मों में लोकेशन कहानी का अहम हिस्सा होती है। बात करें अगर मुंबई शहर की, तो इस शहर को अनगिनत फिल्मों में कभी सपनों के शहर के रूप में, तो कभी संघर्ष और अकेलेपन के तौर पर दिखाया गया है। लेकिन अब इसी शहर को लेकर फिल्मकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे दर्शकों को इस शहर के बारे में नया और क्या दिखाएं। इसी सोच और चुनौती को लेकर निर्देशक रवि उदयवार ने आईएएनएस से अपने विचार साझा किए।

वह इन दिनों अपनी आने वाली रोमांटिक फिल्म 'दो दीवाने शहर में' की रिलीज की तैयारी कर रहे हैं।

आईएएनएस से बात करते हुए रवि उदयवार ने कहा, ''एक फिल्ममेकर के तौर पर मुंबई अब पूरी तरह थक चुकी है। शहर के लगभग हर कोने को सिनेमा में बार-बार दिखाया जा चुका है। गलियां, इमारतें, समुद्र के किनारे, लोकल ट्रेन... सब कुछ दर्शक पहले ही देख चुके हैं। ऐसे में अब सबसे मुश्किल काम यह है कि इसी जानी-पहचानी जगह को नए और दिलचस्प तरीके से कैसे पेश किया जाए। समय के साथ मुंबई का भूगोल और माहौल भी काफी बदल चुका है, इसलिए उसे पर्दे पर दिखाना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।''

निर्देशक ने कहा, "मैं अपनी फिल्म में लुक और माहौल पर बहुत गहराई से काम करता हूं। फिल्म की दुनिया तय करने के लिए पहले यह सोचना पड़ा कि इसका रंग कैसा होगा, भावनाएं कैसी होंगी और कैमरा किस नजर से शहर को देखेगा। जब दर्शक पर्दे पर रंगों और रोशनी में बदलाव महसूस करता है, तो वही बदलाव कहानी की भावना को भी आगे बढ़ाता है। यह पूरी प्रक्रिया एक बड़े अभ्यास की तरह होती है, जिसमें हर फैसला सोच-समझकर लिया जाता है।"

रवि उदयवार ने अपनी पूरी टीम को इस सोच का श्रेय दिया। उन्होंने कहा, ''फिल्म सिर्फ निर्देशक की कल्पना से नहीं बनती, बल्कि सिनेमैटोग्राफर, कॉस्ट्यूम डिजाइनर और बाकी तकनीकी कलाकार मिलकर उसे आकार देते हैं। किरदार क्या पहनते हैं, किस जगह रहते हैं, कैमरा उन्हें कितनी नजदीक से दिखाता है, ये सारी छोटी-छोटी बातें मिलकर कहानी को असरदार बनाती हैं। रंगों का भी खास महत्व होता है, क्योंकि वे भावनाओं को और गहरा करते हैं।''

रोमांटिक फिल्मों को लेकर रवि उदयवार ने कहा, ''रोमांस को महसूस कराने के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक और थीम म्यूजिक का सही इस्तेमाल जरूरी होता है। फिल्म के हर किरदार की अपनी अलग भावनात्मक यात्रा है, इसलिए हर एक के लिए अलग थीम बनाई जाती है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, ये सभी भावनाएं मिलकर एक पूरा भावनात्मक सफर तय करती हैं। ये सब चीजें सीधे तौर पर नहीं दिखाई देतीं, बल्कि कहानी के भीतर धीरे-धीरे सामने आती हैं।''

निर्देशक ने कहा, ''मेरी फिल्म 'दो दीवाने शहर में' में शहर को एक तीसरे किरदार की तरह देखा गया है। इसमें मुंबई सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि वह कहानी और किरदारों की भावनाओं को प्रभावित करती है। शहर का माहौल, उसकी भीड़, उसकी खामोशी, सब कुछ कहानी का हिस्सा बनता है। फिल्म में मुंबई को नए नजरिए से दिखाने की कोशिश की गई है।''

सिद्धांत चतुर्वेदी, मृणाल ठाकुर, संदीपा धर और आयशा रजा की फिल्म 'दो दीवाने शहर में' 20 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है।
 

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