पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था: विशेषज्ञ ने चेताया- राजनीतिक सुधार और भ्रष्टाचार मिटाए बिना नहीं पटरी पर लौटेगी देश की नैया

राजनीतिक सुधार के बिना आर्थिक सुधार संभव नहीं, पाकिस्तान को भ्रष्टाचार खत्म करना होगा: रिपोर्ट


नई दिल्ली, 15 फरवरी। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सबसे पहले उसकी राजनीति को दुरुस्त करना होगा। भ्रष्टाचार से ग्रस्त और कुप्रबंधन वाली राजनीतिक व्यवस्था आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। यह बात पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन में प्रकाशित एक लेख में कही गई है।

यह लेख अर्थशास्त्री साकिब शेरानी ने लिखा है, जो पाकिस्तान की कई पूर्व आर्थिक सलाहकार परिषदों के सदस्य रह चुके हैं। लेख में कहा गया है कि कोई भी आर्थिक व्यवस्था दरअसल राजनीतिक व्यवस्था का ही उत्पाद होती है। राजनीतिक तंत्र सभी उप-प्रणालियों से ऊपर होता है, इसलिए उसमें आई खराबी का असर पूरे ढांचे पर पड़ता है। ऐसे में गिरती हुई अर्थव्यवस्था को राजनीतिक अर्थव्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

लेख में स्पष्ट कहा गया है कि ‘गहरे आर्थिक सुधार’ की बात करना, जबकि भ्रष्ट और कुप्रबंधित राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की अनदेखी करना, खुद को और जनता को धोखा देने जैसा है। निष्कर्ष साफ है कि आर्थिक सुधार के लिए राजनीतिक सुधार अनिवार्य है।

शेरानी ने लिखा है कि जब तक संसाधनों के दोहन और रेंट-सीकिंग पर आधारित मौजूदा राजनीतिक ढांचे को नहीं बदला जाएगा, तब तक वास्तविक और टिकाऊ निवेश की उम्मीद करना व्यर्थ है। ऐसा निवेश, जो नवाचार, दक्षता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाए, फिलहाल एक सपना ही बना रहेगा।

उन्होंने एक तथाकथित ‘एलीट पैनल’ द्वारा दिए जा रहे इस तर्क को भी खारिज किया कि कंपनियों की ‘क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन’ से आर्थिक विकास संभव है। उनके अनुसार यह मान लेना कि उद्योगों की अक्षमता पूरी तरह उनके आंतरिक फैसलों का परिणाम है और बाहरी माहौल का उस पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता, एक अवास्तविक धारणा है।

लेख में बताया गया है कि पाकिस्तान में औपचारिक क्षेत्र की कंपनियां कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रही हैं। इनमें क्षेत्र में सबसे महंगी और बाधित बिजली आपूर्ति, 50 प्रतिशत से अधिक तक का कर बोझ (सुपर टैक्स सहित), ओवर-वैल्यूड विनिमय दर, व्यापक तस्करी और अंडर-इनवॉइसिंग शामिल हैं। इससे करीब 68 अरब डॉलर की समानांतर अर्थव्यवस्था पनप रही है, जो औपचारिक अर्थव्यवस्था को कमजोर करती है।

इसके अलावा कार्यपालिका का अतिक्रमण, भारी नियामकीय बोझ, भ्रष्टाचार और रिश्वत की लागत, कुशल श्रमिकों की कमी, प्रशिक्षण पर अतिरिक्त खर्च, पानी और सुरक्षा पर निजी खर्च, स्थानीय आपराधिक गिरोहों द्वारा वसूली, राजनीतिक नियुक्तियों का दबाव और बार-बार नीतिगत बदलाव जैसी समस्याएं भी उद्योगों के सामने हैं।

लेख के अनुसार इन सभी बाधाओं को दूर किए बिना केवल कंपनियों को दोष देना और उनसे प्रतिस्पर्धी बनने की उम्मीद करना यथार्थ से परे है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए सबसे पहले राजनीतिक ढांचे में व्यापक और ईमानदार सुधार की आवश्यकता है।
 
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