सरकार का बड़ा फैसला: 1 लाख करोड़ के शहरी चुनौती कोष को मंजूरी, बाजार आधारित 4 लाख करोड़ से बदलेगी शहरों की सूरत

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1 लाख करोड़ रुपए के शहरी चुनौती कोष को दी मंजूरी


नई दिल्ली, 14 फरवरी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कल शहरी चुनौती कोष (यूसीएफ) को अनुमोदन प्रदान किया। इसके तहत कुल एक लाख करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता (सीए) दी जाएगी। परियोजना लागत का 25 प्रतिशत हिस्सा केंद्रीय सहायता के रूप में दिया जाएगा, बशर्ते परियोजना लागत का न्यूनतम 50 प्रतिशत हिस्सा बाजार से जुटाया जाए।

इससे अगले पांच वर्षों में शहरी क्षेत्र में कुल चार लाख करोड़ रुपए का निवेश होगा, जो अनुदान आधारित वित्तपोषण से हटकर बाजार से जुड़े, सुधार-उन्मुख और परिणाम-उन्मुख अवसंरचना निर्माण की ओर भारत के शहरी विकास दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।

शहरी चुनौती कोष उच्च गुणवत्ता वाले शहरी बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बाजार वित्त, निजी भागीदारी और नागरिक-केंद्रित सुधारों का लाभ उठाएगा। इस कोष का उद्देश्य लचीले, उत्पादक, समावेशी और जलवायु-अनुकूल शहरों का निर्माण करना है ताकि ये शहर देश के आर्थिक विकास के अगले चरण के प्रमुख चालक बन सकें।

यह कोष वित्त वर्ष 2025-26 से वित्त वर्ष 2030-31 तक परिचालन में रहेगा, जिसकी कार्यान्वयन अवधि वित्त वर्ष 2033-34 तक बढ़ाई जा सकती है।

परियोजना के लिए वित्त व्यवस्था का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा बाजार स्रोतों से जुटाया जाना चाहिए, जिसमें नगरपालिका बांड, बैंक ऋण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) शामिल हैं। शेष हिस्सा राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, शहरी स्थानीय निकायों या अन्य स्रोतों द्वारा प्रदान किया जा सकता है। परियोजनाओं का चयन एक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी चुनौती प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा, जिससे उच्च प्रभाव वाले और सुधार-उन्मुख प्रस्तावों को समर्थन सुनिश्चित होगा।

शहरी शासन, बाजार और वित्तीय प्रणालियों, परिचालन दक्षता और शहरी नियोजन में सुधारों पर विशेष जोर दिया जाएगा।

व्यवस्थित जोखिम-साझाकरण रूपरेखा और सेवा वितरण मानकों के मानकीकरण के माध्यम से निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाएगा। 5,000 करोड़ रुपए का एक समर्पित कोष, विशेष रूप से पहली बार बाजार वित्त तक पहुंच प्राप्त करने वाले शहरों सहित, टियर-II और टियर-III शहरों सहित 4223 शहरों की ऋण योग्यता को बढ़ाएगा।

पूर्वोत्तर और पर्वतीय राज्यों के सभी शहरों/शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) और अन्य राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के छोटे यूएलबी (<1,00,000 जनसंख्या) के लिए पहली बार बाजार वित्त तक पहुंच को सुगम बनाने के लिए, 5,000 करोड़ रुपए की ऋण चुकौती गारंटी योजना को अनुमोदन प्रदान किया गया है। यह योजना पहली बार लिए गए ऋणों के लिए 7 करोड़ रुपए या ऋण राशि का 70 प्रतिशत (जो भी कम हो) तक की केंद्रीय गारंटी प्रदान करेगी।

पहले ऋण के सफल पुनर्भुगतान पर 7 करोड़ रुपए या ऋण राशि का 50 प्रतिशत (जो भी कम हो) की केंद्रीय गारंटी प्रदान की जाएगी। इससे छोटे शहरों में पहली बार न्यूनतम 20 करोड़ रुपए की परियोजनाओं और बाद की परियोजनाओं के लिए 28 करोड़ रुपए तक की परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से समर्थन मिलेगा।

इस कोष के अंतर्गत परियोजनाओं का चयन परिवर्तनकारी प्रभाव, स्थिरता और सुधार-उन्मुखीकरण सहित चुनौतियों पर आधारित रूपरेखा के माध्यम से किया जाएगा। कोष का आवंटन सुधारों, लक्ष्यों और स्पष्ट रूप से परिभाषित परिणामों से जुड़ा होगा। सुधारों की निरंतरता आगे कोष जारी करने के लिए एक पूर्व शर्त होगी। आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के एकल डिजिटल पोर्टल के माध्यम से परियोजनाओं और सुधारों की कागजरहित निगरानी को सुगम बनाया जाएगा।

विकास केंद्रों के रूप में शहर, शहरी क्षेत्रों की पहचान, महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र, एकीकृत स्थानिक आर्थिक और पारगमन योजना जिसमें हरित और अर्ध-हरित क्षेत्र का विकास, पारगमन और आर्थिक गलियारों के साथ विकास, शहरी गतिशीलता, आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाएं शामिल हैं।

शहरों का रचनात्मक पुनर्विकास जिसमें केंद्रीय व्यावसायिक जिलों और विरासत केंद्रों का नवीनीकरण, ब्राउनफील्ड पुनरुद्धार, पारगमन-उन्मुख विकास और विरासत अवसंरचना का जीर्णोद्धार, जलवायु के अनुकूल, आपदा शमन और पूर्वोत्तर व पर्वतीय राज्यों में मौजूदा शहरों को भीड़भाड़ से मुक्त करने के लिए शहरों से दूर शहरों के विकास के उपाय शामिल हैं; और जल एवं स्वच्छता जिसमें जल आपूर्ति, सीवरेज और वर्षा जल प्रणालियों का उन्नयन, ग्रामीण-शहरी अवसंरचना, जल ग्रिड और एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन शामिल है जिसमें स्वच्छता पर विशेष ध्यान देते हुए पुराने अपशिष्टों का उपचार भी शामिल है।

शहरी चुनौती कोष के तहत दी जाने वाली धनराशि एक व्यापक सुधार एजेंडा पर आधारित है, जिसमें शासन और डिजिटल सुधार, साख बढ़ाने के लिए बाजार और वित्तीय सुधार, बेहतर सेवा वितरण और उपयोगिता दक्षता के लिए परिचालन सुधार, शहरी नियोजन और स्थानिक सुधार जिसमें पारगमन-उन्मुख विकास और हरित अवसंरचना शामिल हैं और सुनिर्धारित प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों (केपीआई), तृतीय-पक्ष द्वारा सत्यापन और निरंतर संचालन एवं रखरखाव तंत्रों के साथ परियोजना-विशिष्ट सुधार शामिल हैं।

परियोजनाओं का मूल्यांकन उनके द्वारा परिवर्तनकारी परिणाम देने की क्षमता के आधार पर किया जाएगा, जिसमें आर्थिक, सामाजिक और जलवायु संबंधी सहित राजस्व जुटाना, निजी निवेश, रोजगार सृजन और बेहतर सुरक्षा, समावेशिता, सेवा समानता और स्वच्छता शामिल है।
 

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