विश्व रेडियो दिवस: वह जादू जो टाइटैनिक से AI तक कायम! आज भी मनोरंजन और सूचना का धड़कता दिल

विश्व रेडियो दिवस: डिजिटल वर्ल्ड का भी एंटरटेनमेंट बॉक्स, एआईआर से लेकर एआई वर्ल्ड तक रेडियो का सफर


नई दिल्ली, 12 फरवरी। क्या आपको याद है वह पुराने जमाने का लकड़ी का भारी-भरकम 'बक्सा' जिसकी सुई (डायल) घूमते ही कभी लंदन की खबरें गूंजती थीं, तो कभी सीलोन से आने वाले फिल्मी गाने? क्या आप जानते हैं कि जब 1912 में टाइटैनिक डूब रहा था, तो वह 'रेडियो' ही था जिसने सैकड़ों लोगों की जान बचाने के लिए संकट का संदेश (एसओएस) दुनिया तक पहुंचाया था?

आज, सदी बदल गई है, तकनीक बदल गई है, लेकिन रेडियो का वह जादुई आकर्षण आज भी बरकरार है। 13 फरवरी को रेडियो की इस वैश्विक यात्रा की शुरुआत किसी संयोग से नहीं हुई थी। इसकी नींव 2010 में स्पेनिश रेडियो अकादमी के जॉर्ज अल्वारेज ने रखी थी, लेकिन इसे आधिकारिक मान्यता तब मिली जब यूनेस्को ने 3 नवंबर 2011 को इसे मंजूरी दी। दरअसल, इसी दिन 1946 में 'संयुक्त राष्ट्र रेडियो' की पहली बार स्थापना हुई थी। तब से यह दिन रेडियो की शक्ति और लोकतंत्र में इसकी भूमिका का जश्न बन गया।

भारत में रेडियो का मतलब आकाशवाणी है। रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा दिया गया यह नाम आज भी भारत के करोड़ों लोगों के लिए भरोसे का दूसरा नाम है। 1936 में स्थापित 'ऑल इंडिया रेडियो' ने आजादी के संघर्ष से लेकर आज के 'डिजिटल इंडिया' तक का सफर देखा है। हमें आज भी देवकी नंदन पांडे की वह गंभीर आवाज याद है, जब वे कहते थे, 'यह आकाशवाणी है, अब आप समाचार सुनिए देवकी नंदन पांडे से...'। उन्हें रेडियो का 'सुपरस्टार' कहा जाता था, और भला अमीन सयानी के उस जादुई संबोधन, 'बहनो और भाइयो', को कौन भूल सकता है? प्रसिद्ध कार्यक्रम 'बिनाका गीतमाला' ने रेडियो को हर घर की पहली पसंद बना दिया था।

आज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम 'मन की बात' ने रेडियो को फिर से मुख्यधारा में ला खड़ा किया है। यह साबित करता है कि रेडियो आज भी सूचना, प्रेरणा और रचनात्मकता का सबसे बड़ा संगम है।

प्रसार भारती अब केवल पुराने टावरों तक सीमित नहीं है। 2026 में, 'वेव्स' नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म ने क्रांति ला दी है। यह एक ऐसा ओटीटी ऐप है जहां 65 से ज्यादा लाइव टीवी चैनल और रेडियो स्ट्रीम उपलब्ध हैं। यह ऐप रेडियो के 'डिजिटल अवतार' की सफलता की कहानी कहती है।

जब इंटरनेट ठप हो जाता है, मोबाइल टावर गिर जाते हैं, और बिजली गुल हो जाती है, तब भी रेडियो के जरिए पूरी दुनिया से जुड़ सकते हैं। सामुदायिक रेडियो, रेडियो आज भी आपदाओं के दौरान 'लाइफलाइन' का काम करता है। स्थानीय बोलियों में दी गई बाढ़ की चेतावनी या मौसम का हाल आज भी हजारों जानें बचाता है।

एनालॉग से डिजिटल, डिजिटल से पॉडकास्ट और अब एआई तक, रेडियो ने हर तकनीक को अपना दोस्त बनाया है। एआई भले ही स्क्रिप्ट लिख दे, लेकिन उस स्क्रिप्ट में भावनाएं केवल एक इंसान ही भर सकता है।
 

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