नई दिल्ली, 12 फरवरी। हिंदुस्तान को अंग्रेजों से आजादी तो मिल चुकी थी, लेकिन असल में देश की आधी आबादी के साथ न्याय करना, उसे ताकत देना नए भारत के लिए बड़ी चुनौती थी। समाज में पर्दा प्रथा और बाल विवाह जैसी तमाम कुरीतियां व्याप्त थीं, जो समाज में जड़ों में गहरी तक समाई थीं। ऐसे में समान अधिकार और महिलाओं के मताधिकार के बारे में सोचना भी मुश्किल था। उस दौर में नामुमकिन को मुमकिन बनाने का बीड़ा उठाया था सरोजिनी नायडू ने।
13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ। पहले सरोजिनी चट्टोपाध्याय नाम उनकी पहचान थी। मद्रास से पढ़ाई के बाद लंदन और फिर कैंब्रिज जाना हुआ। इंग्लैंड में महिलाओं के वोटिंग अधिकार से जुड़े अभियान के अनुभव के साथ वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की ओर आकृष्ट हुईं। 1898 में वापस हैदराबाद लौटना हुआ और उसके बाद उसी वर्ष गोविंदराजुलु नायडू से विवाह हुआ, जहां से उनके नाम के साथ नायडू सरनेम जुड़ा।
सरोजिनी नायडू का पहला विख्यात काव्य संग्रह 'द गोल्डन थ्रेशोल्ड' 1905 में प्रकाशित हुआ था। अगले 12 सालों तक वह बहुत ही मनमोहक कविताएं लिखती रहीं। साल 1912 में उनकी कविताओं का दूसरा खंड 'द बर्ड ऑफ टाइम' प्रकाशित हुआ। साल 1917 में उनके तीसरे खंड 'द ब्रोकन विंग्स' के बाद उनके काव्यमय जीवन में लगभग ठहराव सा आ गया, क्योंकि उनका ध्यान राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की ओर मुड़ गया था।
एक दशक के बाद उस समय सरोजिनी नायडू निसंदेह फिर कविता जगत में लौट आईं, जब उन्होंने "द फेदर ऑफ दि डॉन" कृति की रचना की। उनकी कविताओं के चारों खंड, जो भारतीय संस्कृति के सारस्वरूप हैं, कुल मिलाकर उन्हें महान भारतीय लेखिकाओं की परंपरा में स्थापित करने के लिए पर्याप्त हैं। महात्मा गांधी ने सरोजिनी में विषय वस्तु, भावनाओं, रंग और लय, कल्पना, अलंकारों और उपमाओं की विभिन्नता को देखकर उन्हें 'नाइटिंगेल ऑफ इंडिया' (भारत कोकिला) कहा था।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वह कांग्रेस की एक प्रमुख नेता बन चुकी थीं। जब महात्मा गांधी ने औपचारिक रूप से 1 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन आरंभ किया, तब सरोजिनी नायडू इस आंदोलन में कूद पड़ीं और सैकड़ों सभाओं को संबोधित किया। राष्ट्र के साथ-साथ वे खासतौर पर महिलाओं की आवाज बन चुकी थीं।
अगले कुछ सालों में वे असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं। 1924 में आजादी के लिए समर्थन जुटाने के लिए वे दक्षिण अफ्रीका गईं। स्वाधीनता संग्राम के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए 1928-1929 तक उत्तरी अमरीका की यात्रा की। इसी दौरान ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
वे 1924 में पूर्वी अफ्रीकी भारतीय कांग्रेस में भाग लेने वाले दो प्रतिनिधियों में से एक थीं। 1925 में वे कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी जाने वाली पहली भारतीय महिला थीं। आजादी के बाद वे संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) की पहली महिला राज्यपाल बनीं। अपने पूरे करियर में सरोजिनी नायडू ने महिलाओं की शिक्षा और आजादी के लिए काम किया।
"मुझे लगता है कि विश्व-सभ्यता के आगे बढ़ने का समय आ गया है जब देश सेवा और चेतना में लैंगिक भेदभाव नहीं होना चाहिए।"
सरोजिनी नायडू ने 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए समावेशी संविधान की बात की। इसके साथ ही, हर भेदभाव से इतर अपनी प्रगतिशील सोच का परिचय भी दिया था। भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन के 22वें सत्र में विधवाओं के लिए शैक्षणिक सुविधाओं और उनके पुनर्विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए एक प्रस्ताव पारित कराने में सरोजिनी नायडू ने अहम भूमिका निभाई थी। सरोजिनी नायडू ने आगे एनी बेसेंट और अन्य महिलाओं के साथ महिला भारतीय संघ की स्थापना की थी।
सरोजिनी नायडू कवयित्री भी थीं। इन्होंने वीर रस के गीतों के जरिए देश के जनमानस को आजादी की लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था और जब भारत आजाद हुआ था तो संविधान सभा के सभी सदस्यों को राष्ट्रीय ध्वज के तले खड़े होने के लिए प्रेरित किया।
"जब 42 देशों ने बर्लिन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में महिलाओं को भेजा और एक ध्वज परेड शुरू होनी थी, भारत का कोई आधिकारिक झंडा नहीं था। यह मेरे लिए पीड़ा का क्षण था, लेकिन मेरे सुझाव पर कुछ भारतीय महिला प्रतिनिधियों ने तिरंगा झंडा बनाने के लिए अपनी साड़ियों की पट्टियां फाड़ दीं, ताकि हमारे देश को राष्ट्रीय ध्वज की अनुपस्थिति में अपमानित न होना पड़े।"
राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा में ही सरोजिनी नायडू ने यह वक्तव्य दिया था। आजादी की लड़ाई और उसके बाद की विकास यात्रा में सरोजिनी नायडू ने समाज, राजनीति और साहित्य जगत में बदलाव के कई ऐसे ब्लूप्रिंट पेश किए, जो आज भारत की राह रोशन करते हैं।
'द गोल्डन थ्रेशोल्ड' और 'द बर्ड ऑफ टाइम' उनकी भावनाओं के लिखित दस्तावेज हैं।
सरोजिनी नायडू इस बात का आदर्श उदाहरण हैं कि नारी कमजोर नहीं, सबल है और सक्षम है। उनके हित और हक बराबर हैं। महिला अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर उनका नजरिया सटीक और साफ था। राष्ट्रीय महिला दिवस हर साल मनाया जाता है। यह दिन न सिर्फ भारत की 'कोकिला' की ओर से महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए गए अतुल्य योगदान की याद दिलाता है, बल्कि नए भारत में मजबूत होती आधी आबादी के लिए एक संदेश भी है कि समान अधिकारों के लिए संघर्ष कमजोर न पड़ने पाए।