भारत बंद से गरजा बिहार: वामदलों संग सड़कों पर उतरे मजदूर-किसान, केंद्र की जनविरोधी नीतियों पर तीखा हमला

ट्रेड यूनियन के भारत बंद को लेकर बिहार में वामदल के कार्यकर्ता भी सड़क पर उतरे


पटना, 12 फरवरी। ट्रेड यूनियन के राष्ट्रव्यापी हड़ताल के आह्वान का प्रभाव बिहार में भी देखने को मिला। गुरुवार को राजधानी पटना समेत कई जिलों में ट्रेड यूनियन और वामदलों के सदस्य सड़कों पर उतरे। अलग-अलग संगठनों के संयुक्त नेतृत्व में पटना के बुद्ध स्मृति पार्क से सैकड़ों की संख्या में मजदूरों, किसानों, छात्र-नौजवानों और स्कीम वर्कर्स ने जुलूस निकाला। यह जुलूस शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए डाकबंगला चौराहे पर सभा में परिवर्तित हुआ।

भाकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पटना की सड़क पर नजर आए। डाकबंगला चौराहे पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि मजदूरों की इस ऐतिहासिक हड़ताल को खेत मजदूरों, किसानों, छात्रों और नौजवानों का व्यापक समर्थन मिला है, जो सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से लाए गए चार श्रम कोड मजदूरों को अधिकारविहीन बनाने और पूंजीपतियों की मनमानी को कानूनी संरक्षण देने की साजिश हैं। ये श्रम कोड मजदूरों को संगठित होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने से कमजोर करने का प्रयास हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए सरकार को मजबूर किया, उसी प्रकार मजदूरों के संघर्ष से चार श्रम कोड भी वापस कराए जाएंगे।

मनरेगा के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह कानून खेत मजदूरों और ग्रामीण गरीबों को रोजगार की गारंटी देने के लिए बना था। मजदूर संगठनों की मांग है कि मनरेगा के तहत 200 दिन का रोजगार और कम से कम 600 रुपए प्रतिदिन मजदूरी सुनिश्चित की जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने देश की खेती-किसानी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अमेरिका के हितों के सामने गिरवी रख दिया है। कृषि क्षेत्र को विदेशी दबावों के लिए खोलना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है और देश की 60 प्रतिशत आबाजी के जीवन पर सीधा आघात है।
 
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