नई दिल्ली, 10 फरवरी। 97 साल पहले इटली में एक नई कहानी लिखी गई। एक समझौता लेटरन नाम की जगह पर हुआ। 11 फरवरी 1929 को इटली और रोमन कैथोलिक चर्च के बीच हुआ 'लेटरन समझौता' यूरोपीय राजनीति और ईसाई धर्म के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। इस समझौते के माध्यम से वेटिकन सिटी को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता मिली। यह संधि केवल एक राजनीतिक करार नहीं थी, बल्कि लगभग छह दशकों से चले आ रहे उस विवाद का समाधान थी जिसे “रोमन प्रश्न” कहा जाता है।
इस ऐतिहासिक समझौते पर इटली की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनितो मुसोलिनी और वेटिकन की ओर से कार्डिनल पिएत्रो गैस्पारी ने लेटरन में हस्ताक्षर किए। उस समय रोमन कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप पायस ग्यारहवें थे, जिनकी भूमिका इस संधि के नैतिक और वैचारिक आधार को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पोप ने अपने वक्तव्यों में इस संधि को चर्च की “आध्यात्मिक स्वतंत्रता” के लिए अनिवार्य बताया था।
पोप के अनुसार, चर्च का उद्देश्य राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि धार्मिक नेतृत्व किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक दबावों से मुक्त होकर कार्य कर सके। इसी सोच के तहत वेटिकन सिटी को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया गया, ताकि पोप और कैथोलिक चर्च वैश्विक स्तर पर बिना किसी हस्तक्षेप के अपने धार्मिक दायित्व निभा सकें।
लेटरन संधि के तहत इटली ने औपचारिक रूप से यह स्वीकार किया कि वेटिकन सिटी एक स्वतंत्र राष्ट्र होगा, जबकि वेटिकन ने रोम को इटली की राजधानी के रूप में मान्यता दी। इसके साथ ही कैथोलिक धर्म को इटली का राजधर्म घोषित किया गया और चर्च को पहले हुए नुकसान के लिए आर्थिक मुआवजा भी दिया गया। इस समझौते ने इटली और चर्च के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया।
इतिहासकारों के अनुसार, यदि पोप पायस ग्यारहवें का नेतृत्व और उनका संतुलित दृष्टिकोण न होता, तो यह समझौता संभव नहीं हो पाता। उन्होंने चर्च के आध्यात्मिक हितों को प्राथमिकता देते हुए राजनीतिक यथार्थ को स्वीकार किया, जिससे दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से चला आ रहा टकराव समाप्त हो सका।