मालिनी अवस्थी: माटी की सुगंध, बिरह-प्रेम के सुरों से लोक संगीत को मंच से दुनिया तक ले गईं

सुरों की मालिनी: माटी की सोंधी सुगंध, बिरह और प्रेम संबंध, जिनके सुरों से गूंज उठी लोकसंगीत


नई दिल्ली, 10 फरवरी। 11 फरवरी, सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय लोक संगीत के लिए एक उत्सव की तरह है। इसी दिन उत्तर प्रदेश के कन्नौज में जन्म हुआ उस आवाज की, जिसने लोक संगीत को मंच तक लाया, आंगन को फिर से सुरों से भर दिया और मिट्टी की खुशबू को शास्त्रीय अनुशासन के साथ देश-दुनिया तक पहुंचाया। हम बात कर रहे हैं, सुरों की मल्लिका मालिनी अवस्थी की। जब वह गाती हैं, तो ऐसा लगता है, जैसे कोई नदी बह रही हो, कभी शांत, कभी वेगवती, कभी बिरह में डूबी और कभी प्रेम से छलकती।

मालिनी अवस्थी की गायिकी सिर्फ संगीत नहीं है, वह अनुभव है। उनके सुरों में अवधी की मिठास है, भोजपुरी की चपलता है, ब्रज का माधुर्य है और बुंदेलखंड की खुरदरी सच्चाई भी। कजरी हो, ठुमरी हो, दादरा, चैती, सोहर, झूला या निर्गुण हर शैली में वह सिर्फ गाती नहीं, उसे जीती हैं। शायद यही वजह है कि उनके गीत सुनते हुए श्रोता अपने गांव, अपने आंगन और अपनी मिट्टी की यादों में लौट जाते हैं।

लोकसंगीत लंबे समय तक हाशिए पर रहा। उसे या तो पुराना कहकर छोड़ दिया गया या सिर्फ ग्रामीण दायरे तक सीमित मान लिया गया। लेकिन मालिनी अवस्थी ने इस सोच को बदला। उन्होंने यह साबित किया कि लोक संगीत आधुनिक भी हो सकता है, मंचीय भी और युवाओं के दिलों के बेहद करीब भी। "सैंया मिले लरकैयां" जैसे गीत जब वह गाती हैं, तो हजारों कंठ खुद-ब-खुद उनके साथ गुनगुनाने लगते हैं।

भातखंडे संगीत संस्थान, लखनऊ से विधिवत शिक्षा लेने के बाद उन्होंने बनारस घराने की महान गायिका, पद्म विभूषण गिरिजा देवी से दीक्षा ली। गिरिजा देवी की शिष्या होना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी थी, और मालिनी अवस्थी ने उस परंपरा को पूरी गरिमा के साथ आगे बढ़ाया। उन्होंने शास्त्रीय अनुशासन को लोक की सहजता से जोड़ा।

मालिनी अवस्थी सिर्फ गायिका नहीं हैं, वह एक संवेदनशील विचारक भी हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों से उनका जुड़ाव रहा है। इतिहास की छात्रा होने के कारण शायद उन्हें यह भली-भांति समझ आता है कि संस्कृति सिर्फ मनोरंजन नहीं है। यही वजह है कि वह लोक संगीत को बचाने, सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम करती रही हैं। उनकी संस्था 'सोनचिरैया' इसी सोच की उपज है।

फिल्मों में भी उनकी आवाज ने अपनी अलग पहचान बनाई। 'दम लगा के हईशा' का गीत हो या अन्य फिल्में, उनकी गायिकी वहां भी मिट्टी से जुड़ी रहती है। वह लोक को 'फिल्मी' नहीं बनातीं, बल्कि फिल्मों में भी लोक की आत्मा को बचाए रखती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

सम्मानों की सूची भी लंबी है। उन्हें पद्मश्री, यश भारती, कालिदास सम्मान, नारी गौरव और कई अन्य सम्मान मिले। लेखन के क्षेत्र में भी उन्होंने कदम रखा है और उनकी पहली किताब 'चंदन किवाड़' है।
 

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