दूध बेचने से सियासी उड़ान तक: किसानों के मसीहा राजेश पायलट का वो सफर, जिसकी शुरुआत इंदिरा से हुई

सियासत के 'निडर' पायलट : इंदिरा गांधी की उंगली पकड़कर शुरू हुआ वो सफर, जो इतिहास बन गया


नई दिल्ली, 9 फरवरी। एक ऐसे नेता जो कभी खुद संसद की कैंटीन में दूध सप्लाई किया करते थे, आसमान की बुलंदियों को छूते हुए एक दिन राजनीति में उतरे और केंद्र की सरकार में हाईप्रोफाइल मंत्री तक का सफर तय किया। आसमान का यह फौजी भले राजनीति की सीढ़ियां चढ़ता रहा, लेकिन जमीन से नाता कभी नहीं टूटा। बात हो रही है पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और 'किसानों के मसीहा' रहे राजेश पायलट की।

10 फरवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में राजेश्वर प्रसाद उर्फ राजेश पायलट का एक किसान परिवार में जन्म हुआ। मेरठ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट राजेश की तमन्ना सेना में भर्ती होने की थी, लेकिन उसके पहले उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी। एक समय वे पढ़ाई करने के साथ-साथ दूध बांटा करते थे। मंत्रियों की कोठी में दूध देने जाते फिर जल्दी आकर स्कूल भी जाते। हालांकि, उनका सेना में भर्ती होने का सपना भारतीय वायुसेना में 29 अक्टूबर 1966 को मिले कमीशन के साथ पूरा हुआ।

वायुसेना में ऊंची उड़ानें भरते-भरते अचानक राजेश प्रसाद को राजनीति में छलांग लगाने की सूझी और नौकरी छोड़ इंदिरा गांधी की उंगली पकड़ ली। किस्मत ने उनका साथ दिया और 1980 में वे पहली बार भरतपुर से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जीतकर सांसद बने।

राजेश्वर प्रसाद से राजेश पायलट बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। राजेश के राजनीति में आने के साथ क्षेत्र में हवा दौड़ चुकी थी कि इंदिरा गांधी किसी पायलट को भेज रही हैं। जब नामांकन पत्र दाखिल किया तो उन्होंने अपना असली नाम ही उसमें लिखा। लेकिन यह देख उनका एक समर्थक पीछे से बोला कि आपको राजेश्वर प्रसाद नाम से कोई नहीं जानता है, जहां सिर्फ पायलट की चर्चा है। उसी दिन राजेश्वर प्रसाद से नाम बदलकर राजेश पायलट हो गया।

खुद को किसानों का रहनुमा बताने वाले राजेश पायलट मंत्रालय से ज्यादा समय जनसभाओं यानी जनता के बीच बिताया करते थे। उस समय कांग्रेस में शायद ही कोई ऐसा नेता था, जो पायलट से अधिक जनसभाओं में गया हो। कांग्रेस के अभियान के समय उन्होंने लगभग देश के हर राज्य का दौरा किया था।

उनकी पहचान 'हवाई नेता' के रूप में बन चुकी थी। देशभर के दौरे करने में वे इतने व्यस्त रहते थे कि विरोधी भी उन्हें 'हवाई मंत्री' कहने लगे थे। एक इंटरव्यू में राजेश पायलट ने कहा, "कांग्रेस के लिए मदद करना हमारा फर्ज है। मैं इस बात को जरूर मानता हूं कि ये मेरी कमजोरी रही है, क्योंकि मैं पायलट रहा हूं तो फ्लाइंग का मुझे शौक रहा है।"

इंदिरा गांधी और संजय गांधी की उंगली थामकर राजनीति में आए राजेश पायलट ने जब राजनीति में लंबी उड़ानें भरने का सिलसिला शुरू किया था, तो उन्हें पीवी नरसिंह राव के क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का सदस्य माना जाता था, लेकिन उनके राजनीतिक विरोधी महज मौकापरस्त और अति महत्वाकांक्षी मानते थे। यहां तक कि उनके खुद के मंत्री कहते थे कि वे बहुत जल्द बहुत कुछ पा लेना चाहते हैं। इन घटनाक्रमों को लेकर उन दिनों के अखबारों में 'पायलट की कार्यशैली पर कांग्रेसियों ने विरोध जताया' और 'पार्टी में तीसरा ध्रुव बना रहे पायलट' जैसी हेडलाइनों के साथ खबरें छपती थीं।

वे कभी पार्टी में संकटमोचन की भूमिका निभाने वाले कहलाए तो कभी-कभी खुद प्रधानमंत्री के लिए संकट पैदा करते थे। किसानों की बात हो या जम्मू-कश्मीर की समस्या या पार्टी का अंदरूनी संकट, हर मामले को सुलझाने की कोशिश में खुद-ब-खुद लगते रहे थे। यहां तक कि वे अपने मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री, या यूं कहें कि अपने सीनियर मंत्री से भी भिड़ जाते थे।

इंटरव्यू में राजेश पायलट ने खुद स्वीकार किया कि किसी खास विषय पर उनके अपने साथी मंत्रियों और नेताओं के साथ मतभेद रहे। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि पार्टी नेताओं और मंत्रियों से मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी से व्यक्तिगत झगड़े नहीं थे।

राजेश पायलट को जीप चलाने का शौक था। अपनी जीप वे अधिकतर खुद ही ड्राइव कर लेते थे। 11 जून 2000 को अपने चुनावी क्षेत्र दौसा से एक सभा से लौटते वक्त जयपुर हाईवे पर उनकी जीप एक ट्रॉले से टकरा गई, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए और उसी दिन सवाई मानसिंह अस्पताल में उनका निधन हो गया।
 

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