सुधा मूर्ति: 1979 में अमेरिका ने देखा संदेह से, अब करता है सम्मान, भारत की बदलती पहचान का कमाल

पहले विदेश में संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, अब अमेरिका सम्मान देता हैः सुधा मूर्ति


नई दिल्ली, 9 फरवरी। राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति ने 1979 में की गई अपनी पहली अमेरिका यात्रा और हाल के दिनों में की गई एक और यात्रा का एक निजी अनुभव साझा किया। केंद्रीय बजट पर चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि पहली यात्रा के समय उन्हें वहां वीजा और कस्टम अधिकारियों द्वारा उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा गया, भारत को लेकर कई अज्ञानतापूर्ण सवाल पूछे गए, जिससे उन्हें बुरा लगा।

वहीं हाल में की गई यात्रा का अनुभव बिल्कुल उलटा था। इस बार अधिकारियों ने न केवल सम्मान से व्यवहार किया, बल्कि भारत, बेंगलुरु और भारतीयों की मेहनत, उद्यमिता, कानून पालन और संस्कृति की खुले दिल से प्रशंसा की।

उन्होंने बताया कि 1979 में पहली बार अमेरिका की यात्रा के समय उनसे कई सवाल पूछे गए थे, जैसे कि आप इस देश में क्यों आई हैं, कब वापस जाएंगी, आपके पति का वेतन कितना है, कितने समय रहना चाहती हैं, वापसी का टिकट आदि।

सुधा मूर्ति ने कहा कि यह सब सवाल 28 साल की एक युवा महिला के लिए आसान नहीं थे, जो पहली बार विदेश जा रही थी। मैंने सभी सवालों के जवाब दिए। अधिकारियों ने मेरा रिटर्न टिकट देखा। फिर मैंने कहा कि मुझे छह महीने का वीजा चाहिए।

अधिकारी ने साफ कहा, नहीं, आपको केवल तीन महीने का वीजा मिलेगा। उसने 3 महीने के वीजा पर मुहर लगा दी, लेकिन कोई वजह नहीं बताई। मुझमें भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं पूछ सकूं कि सिर्फ तीन महीने ही क्यों। वहीं कस्टम अधिकारी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, 'लेडी, आपने ये क्या पहन रखा है?' मैंने कहा, 'सर, इसे साड़ी कहते हैं।' फिर उसने कहा, 'क्या भारत के बारे में थोड़ा-बहुत जानता हूं। क्या आपके यहां सड़कों पर सांप चलते हैं?' मैंने कहा, 'नहीं, बहुत कम लोग जादूगर होते हैं।'

सुधा मूर्ति ने बताया कि कस्टम अधिकारी उन्हें ऐसे देख रहा था जैसे वह किसी दूसरे ग्रह से आई थीं। इसके बाद उन्होंने हाल के वर्षों में अमेरिका की एक यात्रा का जिक्र किया, जहां अनुभव बिल्कुल उलटा था। इस बार अधिकारियों ने न केवल सम्मान से व्यवहार किया, बल्कि भारत, बेंगलुरु और भारतीयों की मेहनत, उद्यमिता, कानून पालन और संस्कृति की खुले दिल से प्रशंसा की।

उन्होंने कहा कि आज भारत को दुनिया स्टार्टअप्स, यूनिकॉर्न, आईटी, मेहनती लोगों और समृद्ध संस्कृति के देश के रूप में पहचानती है। सुधा मूर्ति ने कहा कि पिछले 10–15 वर्षों में भारत की वैश्विक छवि में जो बदलाव आया है, उसका कारण स्थिर सरकार, मजबूत और साहसिक बजट, स्थिर वित्त व्यवस्था और ऐसा नेतृत्व जो भारतीय संस्कृति पर गर्व करता है और भारतीयों की क्षमता पर भरोसा करता है।

उन्होंने कहा कि चुनौतियां और कठिनाइयां जरूर हैं, लेकिन एक दिन में कुछ नहीं बनता। सही नेतृत्व, अच्छे मूल्य और जनहितकारी नीतियों के साथ भारत हर लक्ष्य हासिल कर सकता है।

सुधा मूर्ति ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लगातार नौवां बजट पेश करने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि एक महिला के रूप में उन्हें इस उपलब्धि पर गर्व है, और यह देश के लिए भी खुशी का क्षण है। सुधा मूर्ति ने बजट में संस्कृति, पुरातत्व और विरासत संरक्षण के लिए किए गए प्रावधानों की सराहना की।

उन्होंने ‘प्रोजेक्ट मौसम’ को आगे बढ़ाने का सुझाव देते हुए कहा कि भारत को पुरी या कोणार्क जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर उन 39 देशों का एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करना चाहिए, जिनसे प्राचीन काल में भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं।

उन्होंने बजट में प्रस्तावित ‘शी-मार्केट’ (महिला बाजार) पहल की भी सराहना की, लेकिन इसके लिए कुछ सुझाव भी दिए, जैसे कि बाजार स्वावलंबी हों, अच्छी तरह से रोशनी युक्त और सुरक्षित स्थानों पर हों, स्तनपान कराने वाली माताओं और गर्भवती महिलाओं के लिए पर्याप्त सुविधाएं हों, और ऐसे स्थानों पर हों जहां ग्राहकों की सहज पहुंच हो, ताकि महिलाओं को अपने व्यवसाय में सफलता मिले।

उन्होंने कहा कि हर जिले में महिला छात्रावास बनाने का प्रस्ताव अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शौचालय और सुरक्षित आवास महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाते हैं।
 

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