नई दिल्ली, 5 फरवरी। दिल्ली हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण कानून के तहत एक महिला को हर महीने 26,000 रुपए अंतरिम भरण-पोषण देने के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि व्यभिचार के बिना सबूत वाले आरोपों के आधार पर अंतरिम स्तर पर ऐसी मदद से इनकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की एकल पीठ ने पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। पति ने मजिस्ट्रेट और सत्र अदालत के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें उसे अलग रह रही पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
पति ने दलील दी कि पत्नी कथित रूप से व्यभिचार में रह रही है, इसलिए उसे भरण-पोषण नहीं मिलना चाहिए। कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। जस्टिस शर्मा ने कहा कि ऐसे विवादित तथ्य केवल ट्रायल के दौरान सबूत आने के बाद ही तय किए जा सकते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम आदेश देते समय अदालत को रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर केवल प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसि) राय बनानी होती है। साथ ही यह भी कहा कि घरेलू हिंसा कानून के तहत अंतरिम भरण-पोषण सिर्फ बिना साबित हुए अवैध संबंध के आरोपों के आधार पर नहीं रोका जा सकता।
अदालत ने पति द्वारा पेश की गई उन तस्वीरों का भी जिक्र किया, जिनके बारे में दावा किया गया था कि उनमें पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिख रही है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि इन तस्वीरों की सच्चाई और विश्वसनीयता की जांच ट्रायल के दौरान ही हो सकती है।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि ये तस्वीरें अभी कानून के अनुसार साबित नहीं हुई हैं, और पक्षों के सबूत आने के बाद ही इन पर फैसला किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने धारा 125 सीआरपीसी और घरेलू हिंसा कानून के बीच अंतर बताते हुए कहा कि जहां सीआरपीसी की धारा 125(4) में व्यभिचार में रह रही पत्नी को भरण-पोषण न देने का स्पष्ट प्रावधान है, वहीं घरेलू हिंसा कानून में ऐसा कोई साफ प्रावधान नहीं है जो केवल व्यभिचार के आरोप के आधार पर महिला को राहत से वंचित करे।
कोर्ट ने कहा कि पत्नी के आचरण से जुड़ा कोई भी सबूत, जिसमें व्यभिचार के आरोप भी शामिल हैं, महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इस पर फैसला सबूत आने के बाद ही किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने माना कि दोनों के बीच घरेलू संबंध होना विवादित नहीं है। अदालत ने यह भी नोट किया कि पत्नी ने शादी के दौरान शारीरिक, यौन, मानसिक, मौखिक और आर्थिक उत्पीड़न के विस्तृत आरोप लगाए हैं।
प्रथम दृष्टया कोर्ट ने कहा कि बार-बार अपमान, आर्थिक सहायता से इनकार, गाली-गलौज और चरित्र हनन जैसे आरोप घरेलू हिंसा की परिभाषा में आते हैं।
सुरक्षा अधिकारी द्वारा दाखिल घरेलू घटना रिपोर्ट से भी प्रथम दृष्टया पत्नी के मामले को समर्थन मिला।
हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि घरेलू हिंसा से जुड़ी याचिका का निपटारा जल्द से जल्द किया जाए, और कोशिश हो कि एक साल के भीतर फैसला हो।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर अंतिम फैसले में ट्रायल कोर्ट यह पाता है कि पत्नी व्यभिचार के कारण भरण-पोषण की हकदार नहीं है तो उसे मिली पूरी अंतरिम राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ वापस करनी होगी।
इसके साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल करे, जिसमें वह यह वचन दे कि अगर अंत में उसे भरण-पोषण के लिए अयोग्य पाया गया तो वह पूरी राशि ब्याज सहित लौटाएगी।