राहुल-बिट्टू की सियासी जंग पर दलजीत चीमा का तीखा हमला: बोले- संसद राजनीतिक अपरिपक्वता का स्कूल गेट बनी

राहुल-बिट्टू विवाद पर दलजीत सिंह चीमा का तंज, बोले- संसद स्कूल गेट की लड़ाई बन गई


चंडीगढ़, 5 फरवरी। शिरोमणि अकाली दल की कोर कमेटी की अहम बैठक गुरुवार को चंडीगढ़ में आयोजित की जानी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने बैठक की जानकारी देते हुए बताया कि इसमें पंजाब की मौजूदा राजनीतिक स्थिति के साथ-साथ देश की वर्तमान राजनीति पर भी विस्तार से चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जो राजनीतिक घटनाक्रम चल रहे हैं, उन पर पार्टी गंभीर मंथन करेगी।

इस दौरान दलजीत सिंह चीमा ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को 'गद्दार' कहे जाने के मुद्दे पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संसद में जो कुछ हुआ, चाहे वह राहुल गांधी हों या रवनीत बिट्टू, यह हमारे नेताओं की राजनीतिक अपरिपक्वता और आज की राजनीति के गिरते स्तर को दिखाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि संसद जैसे गंभीर मंच पर राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय बहस इस बात पर सिमट गई है कि कौन गद्दार है और कौन नहीं।

चीमा ने कहा कि एक तरफ राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं और दूसरी तरफ रवनीत बिट्टू भारतीय जनता पार्टी के मंत्री हैं। ऐसे में जनता को उनसे क्या उम्मीद रखनी चाहिए? उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि नेताओं का यह व्यवहार स्कूल की छुट्टी के बाद गेट पर झगड़ते बच्चों जैसा है। अगर देश के नेता ऐसा आचरण करेंगे तो फिर देश उनसे और क्या अपेक्षा कर सकता है? उन्होंने कहा कि नेताओं को खुद इस पर आत्ममंथन करना चाहिए।

इसके अलावा, दलजीत सिंह चीमा ने संसद के भीतर उस विवाद पर भी प्रतिक्रिया दी, जो राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की किताब को संसद में रखने को लेकर हुआ। इस पर उन्होंने कहा कि अगर कोई भी मुद्दा है, तो उसे संसद के माध्यम से देश के सामने रखा जाना चाहिए। संसद ही ऐसा मंच है जहां देश के अहम मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि यदि संसद में किसी की बात नहीं सुनी जाती है, तो उसके बाद मीडिया के जरिए अपनी बात देश तक पहुंचाई जा सकती है। लेकिन संसद के भीतर जिस तरह का हंगामा और आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिल रहा है, वह लोकतंत्र और संसदीय गरिमा के लिए ठीक नहीं है।

अकाली दल नेता ने साफ कहा कि देश की जनता नेताओं से गंभीरता, जिम्मेदारी और मुद्दों पर आधारित राजनीति की उम्मीद करती है, न कि व्यक्तिगत आरोपों और नाटकीय बहसों की।
 

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