राजेश खन्ना के 'आराधना' वाले दोस्त से भोजपुरी के पहले सुपरस्टार तक, सुजीत कुमार का अद्भुत सफर

आराधना मूवी में राजेश खन्ना की जीप चलाने वाला वो 'दोस्त', जो अपनी माटी के लिए बना 'भोजपुरी का पहला सुपरस्टार'


मुंबई, 4 फरवरी। कल्पना कीजिए दार्जिलिंग की हसीन वादियों की, एक खुली जीप पहाड़ी रास्तों पर दौड़ रही है और उसमें सुपरस्टार राजेश खन्ना गा रहे हैं, 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू...'। भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह गीत अमर है। क्या आपने कभी उस जीप को चलाने वाले व्यक्ति पर गौर किया, जो हाथ में माउथ ऑर्गन लिए गा रहा है, जिसकी सादगी और मुस्कुराहट ने उस पूरे दृश्य को एक विश्वसनीय आधार दिया? वो शख्स कोई और नहीं, बल्कि सुजीत कुमार थे।

बॉलीवुड के लिए वो एक 'लकी चार्म' और वफादार दोस्त थे, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार की माटी के लिए वे 'प्रथम सुपरस्टार' थे। शमशेर बहादुर सिंह से सुजीत कुमार बनने तक का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं है।

7 फरवरी 1934 को वाराणसी के पास चकिया के एक किसान परिवार में जन्मे सुजीत कुमार का अभिनय से दूर-दूर तक नाता नहीं था। वे कानून (एलएलबी) की पढ़ाई कर रहे थे और उनका इरादा अदालत में दलीलें पेश करने का था। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।

कॉलेज के दिनों में एक नाटक के दौरान प्रसिद्ध निर्देशक फणी मजूमदार की नजर उन पर पड़ी। मजूमदार उनकी लंबी कद-काठी और रौबीली आवाज से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शमशेर को वकालत छोड़कर बंबई आने की सलाह दी। एक नौजवान के लिए यह फैसला जोखिम भरा था, लेकिन शमशेर ने साहस दिखाया और 'सुजीत कुमार' के नाम से मायानगरी में कदम रखा।

1960 के दशक में सुजीत कुमार ने हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनानी शुरू की। उस दौर में सस्पेंस और मिस्ट्री फिल्मों का बहुत क्रेज था। 1966 में आई फिल्म 'लाल बंगला' ने उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में स्थापित किया जो रहस्यमयी कहानियों को अपने कंधों पर ढो सकता था। 'एक साल पहले' और 'लंबू इन हांगकांग' जैसी फिल्मों ने उन्हें मध्यम बजट की फिल्मों का भरोसेमंद चेहरा बना दिया। हालांकि, मुख्यधारा के सिनेमा में उनकी असली चमक अभी बाकी थी।

सुजीत कुमार का सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान क्षेत्रीय सिनेमा में रहा। 1963 में आई फिल्म 'बिदेसिया' ने उन्हें पूर्वांचल और बिहार के घर-घर में पहुंचा दिया। इसमें उनके द्वारा निभाया गया 'बिदेसी ठाकुर' का पात्र आज भी लोक-संस्कृति का हिस्सा है।

लेकिन असली चमत्कार हुआ 1977 में। उस समय भोजपुरी सिनेमा लगभग दम तोड़ रहा था। फिल्मों का निर्माण बंद था और दर्शक हिंदी फिल्मों की ओर रुख कर चुके थे। ऐसे में सुजीत कुमार 'दंगल' लेकर आए, जो भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म का गीत 'काशी हिले पटना हिले' आज भी उत्सवों की जान है। वहीं, भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' (1962) में दिग्गज अभिनेता सुजीत कुमार ने एक सहायक अभिनेता के रूप में काम किया था।

'दंगल' ने न केवल भारत में बल्कि मॉरीशस और फिजी जैसे देशों में भी सफलता के झंडे गाड़ दिए। इसने भोजपुरी फिल्म उद्योग को पुनर्जीवित किया, इसीलिए सुजीत कुमार को भोजपुरी सिनेमा का 'भीष्म पितामह' और 'पहला सुपरस्टार' कहा जाता है।

70 के दशक में सुजीत कुमार ने अपनी रणनीति बदली। जहां वे भोजपुरी में 'किंग' थे, वहीं बॉलीवुड में उन्होंने चरित्र भूमिकाओं को पूरी ईमानदारी से निभाया। सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी बेमिसाल थी। 'आराधना', 'हाथी मेरे साथी', 'अमर प्रेम' और 'अवतार' जैसी करीब 12 सुपरहिट फिल्मों में वे खन्ना के साथ नजर आए। निर्माताओं का मानना था कि सुजीत कुमार फिल्म में हों तो सफलता निश्चित है।

एक और दिलचस्प रिकॉर्ड सुजीत कुमार के नाम है। उन्होंने भारतीय सिनेमा में सबसे अधिक बार 'पुलिस ऑफिसर' की भूमिका निभाने वाले अभिनेताओं में से एक का गौरव प्राप्त किया। 'इत्तेफाक' का तेज-तर्रार इंस्पेक्टर हो या 'क्रांतिवीर' का पुलिस कमिश्नर, वर्दी उन पर जंचती थी।

सुजीत कुमार केवल कैमरे के सामने ही नहीं, बल्कि कैमरे के पीछे भी सक्रिय रहे। उन्होंने अपनी पत्नी किरण सिंह के साथ मिलकर 'शिव भक्ति फिल्म्स' की नींव रखी। एक निर्माता के तौर पर उन्होंने 'खेल' (अनिल कपूर-माधुरी दीक्षित), 'दरार' और 'चैंपियन' (सनी देओल) जैसी सफल फिल्में दीं।

उनकी फिल्म 'पान खाए सैयां हमार' (1984) सुजीत कुमार के कद का प्रमाण थी। इस क्षेत्रीय फिल्म में उनके सम्मान में अमिताभ बच्चन और रेखा जैसे दिग्गजों ने अतिथि भूमिका निभाई थी। यह उनके व्यक्तिगत संबंधों और उद्योग में उनके प्रति सम्मान को दर्शाता है।

सुजीत कुमार, जितेंद्र और राकेश रोशन की दोस्ती बॉलीवुड के गलियारों में मशहूर थी। ये तीनों 'जुहू सर्कल' के अभिन्न अंग थे। वे हर सुबह साथ में जिम करते और जुहू बीच पर सैर करते थे। यह दोस्ती केवल व्यायाम तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने कई व्यावसायिक प्रोजेक्ट्स में भी एक-दूसरे का हाथ थामा।

2007 में इस महानायक को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी ने घेर लिया। पत्नी के निधन के बाद वे थोड़े अकेले जरूर हुए, लेकिन उनके बच्चों जतिन और हेन्ना ने उन्हें संभाला। 5 फरवरी 2010 को, अपने 76वें जन्मदिन से ठीक दो दिन पहले, भारतीय सिनेमा का यह चमकता सितारा हमेशा के लिए अस्त हो गया। सुजीत कुमार को भोजपुरी सिनेमा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।
 
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