भारत की पड़ोस नीति में बड़ा बदलाव: विशेषज्ञ बोले- सिर्फ सद्भावना नहीं, अब क्षेत्रीय स्थिरता और राजनीतिक हकीकत पर जोर

विशेषज्ञों ने भारत की पड़ोस नीति के विकास पर की चर्चा


नई दिल्ली, 3 फरवरी। भारत की पड़ोस नीति को लेकर नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के अग्रणी प्रतिनिधियों और विषय विशेषज्ञों ने खास चर्चा की। इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत की पड़ोस की नीति अब सिर्फ पुरानी अच्छी भावना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग राजनीतिक सच्चाइयों पर भी ध्यान देती है और इलाके की स्थिरता को भी सुरक्षित रखती है।

इस चर्चा का आयोजन चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) ने किया था। चर्चा का नाम 'भारत और उसके पड़ोस से और उसके अंदर के नजरिए' था। विशेषज्ञ ने भारत की पड़ोस नीति के विकास पर चर्चा की। इसके साथ ही इस क्षेत्र के सामने आने वाली आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों पर विषयगत विश्लेषण भी किया।

जैसे-जैसे देश बदलती क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति से जूझ रहे हैं, विशेषज्ञों ने माना कि भारत ने दक्षिण एशिया और अपने बड़े पड़ोस में स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए अपनी सुरक्षा चिंताओं, विकास साझेदारी और आर्थिक डिप्लोमेसी में संतुलन बनाने की कोशिश की है।

उन्होंने बताया कि भारत का अपने पड़ोस के प्रति नजरिया लंबे समय से भूगोल और इतिहास से बना है, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इस बात में आसानी से बताया गया है कि "आप अपने दोस्त बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं।" विशेषज्ञों ने इस सच्चाई पर जोर दिया कि यह भारत की पड़ोस नीति को बनाती रहती है, जहां लंबे समय तक चलने वाले सांस्कृतिक संबंध मुश्किल रणनीतिक फैसलों से जुड़ते हैं।

सीआरएफ के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने इस बात पर जोर दिया कि पड़ोस भारत का सबसे मुश्किल स्ट्रेटेजिक थिएटर है। शिशिर प्रियदर्शी ने इसी थीम पर छवि वशिष्ठ के साथ मिलकर एक किताब एडिट की है।

कार्यक्रम के दौरान प्रियदर्शी ने कहा कि जियोपॉलिटिकल कॉम्पिटिशन, साउथ एशिया में राजनीतिक बदलाव, जलवायु दबाव और बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था से बढ़ती उम्मीदों के बीच भारत की पड़ोस नीति बहुत मुश्किल होती जा रही है। भारत अपनी पड़ोस नीति के साथ जुड़ते समय एक जैसा तरीका नहीं अपना सकता।

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि बदलते क्षेत्रीय डायनामिक्स ने भारत के नेबरहुड एंगेजमेंट में मुश्किलों की नई परतें जोड़ दी हैं। हाल के सालों में साउथ एशिया में राजनीतिक बदलाव और अंदरूनी उथल-पुथल देखी गई है, जिसमें नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में हुए विकास शामिल हैं। इसके लिए भारत को अपने कूटनीतिक और रणनीतिक तरीकों को बदलना पड़ा है।

2024 में बांग्लादेश में राजनीतिक अशांति, मालदीव के हालात और म्यांमार में जारी अंदरूनी झगड़े ने एक ज्यादा सोची-समझी, रिस्पॉन्सिव नेबरहुड स्ट्रेटेजी की जरूरत पर जोर दिया है। ये चुनौतियां इस इलाके में चीन की बढ़ती मौजूदगी, खासकर बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के जरिए और बढ़ गई हैं।

सीआरएफ के सदस्य वशिष्ठ ने कहा कि यह इलाका फिक्स्ड एजेंसी के बजाय लगातार बदलाव की स्थिति में काम करता है। 'पड़ोसी फर्स्ट' सिर्फ नई दिल्ली का नारा नहीं है और केंद्रीय बजट में करीबी पड़ोसियों को दिए गए आवंटन इस बात पर जोर देते हैं कि विकास में मदद, कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट और कैपेसिटी-बिल्डिंग और सुरक्षा आज भारत की क्षेत्रीय डिप्लोमेसी का केंद्र हैं।

आगे की चर्चाओं में भारत के राष्ट्रीय हितों को क्षेत्रीय विकास और सुरक्षा के साथ संतुलन करने की कोशिशों पर जोर दिया गया, जिसमें 2014 के शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी नेताओं को शामिल करने और कोविड-19 संकट के दौरान मदद करने जैसी डिप्लोमैटिक पहल शामिल हैं।

एक्सपर्ट्स ने यह नतीजा निकाला कि भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' पॉलिसी के सिद्धांत अभी भी प्रासंगिक हैं, लेकिन पड़ोसी राज्यों के अंदर बदलती घरेलू राजनीति, भारत के बारे में लोगों की बदलती सोच और रणनीतिक कमजोरी के नए रूपों को ध्यान में रखते हुए उन्हें फिर से लागू करने की जरूरत है। इसलिए बातचीत में अंतर होना चाहिए। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव, भूटान और अफगानिस्तान सभी को एक जैसे डिप्लोमैटिक जवाब के बजाय अलग-अलग नीति की जरूरत है।
 
Similar content Most view View more

Latest Replies

Forum statistics

Threads
16,711
Messages
16,748
Members
20
Latest member
7519202689
Back
Top