क्यों दहक रहा बलूचिस्तान? रिपोर्ट ने बताया- दशकों के दमन का है नतीजा, बाहरी हस्तक्षेप नहीं अंदरूनी उबाल

बलूचिस्तान में उग्रवाद दशकों के भीषण दमन का नतीजा, बाहरी हस्तक्षेप नहीं: रिपोर्ट


क्वेटा, 3 फरवरी। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लंबे समय से जारी उग्रवाद ने 31 जनवरी को एक नया और गंभीर मोड़ ले लिया, जब बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने एक साथ कई शहरों में समन्वित हमले किए। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ये घटनाएं किसी बाहरी हस्तक्षेप का नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे राजनीतिक, आर्थिक और मानवाधिकार संबंधी दमन का परिणाम हैं।

बांग्लादेश स्थित अखबार ब्लिट्ज की रिपोर्ट के अनुसार, यह पहली बार था जब बलूचिस्तान के 12 शहरों (क्वेटा, ग्वादर, खारान, पंजगुर, पसनी, मस्तुंग, नोश्की, दलबंदीन, कलात, तुरबत, बुलेदा और केच) में एक साथ समन्वित अभियान चलाए गए। इन अभियानों में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की भागीदारी भी देखने को मिली, जो न केवल आत्मघाती हमलावरों के रूप में बल्कि सशस्त्र लड़ाकों के तौर पर भी शामिल थीं। यह बलूच समाज में व्याप्त गहरे आक्रोश और हताशा को दर्शाता है।

बीएलए ने इन हमलों को ‘ऑपरेशन हेरोफ फेज़-II’ का हिस्सा बताते हुए कहा कि यह पाकिस्तानी सुरक्षा चौकियों और चीनी बुनियादी ढांचे के खिलाफ एक योजनाबद्ध अभियान है।

संगठन के बयान में कहा गया, “हमने बलूचिस्तान के कई शहरों में एक साथ हमले कर सैन्य, पुलिस, खुफिया और प्रशासनिक ठिकानों को निशाना बनाया। 80 से अधिक दुश्मन कर्मियों को निष्क्रिय किया गया, 18 लोगों को बंधक बनाया गया और 30 से ज्यादा सरकारी संपत्तियों को नष्ट किया गया। मजीद ब्रिगेड सहित हमारे लड़ाकों ने आपसी समन्वय से कई इलाकों में कार्रवाई की और अस्थायी रूप से पाकिस्तानी बलों की आवाजाही को बाधित किया।”

ब्लिट्ज में स्तंभकार और लेखक अरुण आनंद ने लिखा कि स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार, उग्रवादियों, सुरक्षा बलों और आम नागरिकों सहित कुल मृतकों की संख्या 125 से अधिक हो सकती है, जो इन अभियानों की तीव्रता को दर्शाता है। हमलों के कारण प्रभावित इलाकों में सड़क यातायात, परिवहन, इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं भी बाधित रहीं।

बलूच उग्रवाद का इतिहास पाकिस्तान के गठन के समय, वर्ष 1948 से जुड़ा है। कलात रियासत के पाकिस्तान में विलय के तुरंत बाद राज्य के खिलाफ प्रतिरोध शुरू हो गया था। इसके बाद 1948, 1958–59, 1962–63, 1973–77 और 2000 के दशक की शुरुआत से लेकर अब तक कई चरणों में उग्रवाद देखने को मिला है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इतने लंबे और निरंतर संघर्ष को केवल बाहरी ताकतों से जोड़ना स्थानीय और ऐतिहासिक रूप से जमी गहरी शिकायतों को नजरअंदाज करने जैसा है। इस संघर्ष की जड़ें राजनीतिक हाशिए पर डाले जाने, आर्थिक शोषण, जनसांख्यिकीय असुरक्षा और व्यापक मानवाधिकार उल्लंघनों में हैं। जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों, मनमानी गिरफ्तारियों और सैन्य अभियानों जैसे आरोप वर्षों से सामने आते रहे हैं।

मानवाधिकार परिषद बलूचिस्तान, वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स, बलूच यकजैती कमेटी और गुलज़ार दोस्त जैसे कार्यकर्ताओं ने लंबे समय से जबरन गुमशुदगी और मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों को दर्ज किया है। वहीं, पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग और अंतरराष्ट्रीय संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी व्यापक उल्लंघनों, सैन्यीकरण और जवाबदेही की कमी की ओर ध्यान दिलाया है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार तंत्र ने भी पाकिस्तान से इन गंभीर मुद्दों के समाधान का आग्रह किया है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि बलूच उग्रवाद में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आमतौर पर संघर्ष क्षेत्रों में महिलाएं हथियार नहीं उठातीं, लेकिन सामाजिक ढांचे के टूटने और अत्यधिक राज्य दमन की स्थिति में कई बलूच महिलाएं अपने परिजनों के अपहरण या हत्या के बाद सशस्त्र आंदोलनों में शामिल हुई हैं।

प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे गरीब प्रांत बना हुआ है। यहां प्राकृतिक गैस, खनिज, कोयला, तांबा, सोना और ग्वादर जैसे रणनीतिक बंदरगाह मौजूद हैं, लेकिन सड़कें, अस्पताल, स्कूल, बिजली और रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान के संसाधनों से सबसे अधिक लाभ पंजाब और केंद्र सरकार को मिलता है, जिससे यह प्रांत आर्थिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर बना हुआ है।

बीएलए द्वारा चीनी बुनियादी ढांचे, विशेषकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) के तहत विकसित ग्वादर बंदरगाह को निशाना बनाया जाना, स्थानीय लोगों के उस गुस्से को दर्शाता है, जो इन परियोजनाओं को शोषणकारी और गैर-समावेशी मानते हैं।
 
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