पाकिस्तान में पोलियो: 31 साल के अभियानों के बावजूद क्यों पैदा हुई 'अदृश्य पीड़ितों' की फौज

जनता के अविश्वास और व्यवस्थागत खामियों के बीच पाकिस्तान की पोलियो समस्या बरकरार


इस्लामाबाद, 3 फरवरी। तीन दशकों से अधिक समय तक चलाए गए आक्रामक उन्मूलन अभियानों के बावजूद पाकिस्तान में पोलियो की समस्या अब भी बनी हुई है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जनता के अविश्वास और व्यवस्थागत खामियों के कारण पोलियो उन्मूलन के प्रयास अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की टी-मैगज़ीन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने वर्ष 1994 में पहली बार पोलियो विरोधी अभियान शुरू किया था। इसके बावजूद पिछले 31 वर्षों में देश में कुल 14,206 पोलियो मामलों की पुष्टि दर्ज की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पोलियो से दिव्यांग हो चुके बच्चों के इलाज, पुनर्वास और दीर्घकालिक सामाजिक समावेशन के लिए सरकार द्वारा संचालित किसी प्रभावी प्रणाली के अभाव में देश में पोलियो पीड़ितों की एक “अदृश्य आबादी” तैयार हो गई है।

रिपोर्ट में कहा गया, “अब तक देश में पोलियो पीड़ितों के लिए न तो सार्वजनिक पुनर्वास केंद्र हैं, न ही व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम और न ही मनो-सामाजिक सहयोग की कोई व्यवस्था। इसके चलते परिवारों को महंगे निजी इलाज का सहारा लेना पड़ता है, जिसे वहन करना कई लोगों के लिए संभव नहीं है। संरचित सहयोग के अभाव में दिव्यांग बच्चे और वयस्क उपेक्षा और शोषण के शिकार बन रहे हैं तथा शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी में लगातार बाधाओं का सामना कर रहे हैं।”

नेशनल इमरजेंसी ऑपरेशंस सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में 1994 में पोलियो के सबसे अधिक 2,635 मामले सामने आए थे, जिसके बाद मामलों में धीरे-धीरे गिरावट दर्ज की गई।

हालांकि, वर्ष 2025 में पोलियो के मामलों में फिर से उछाल देखा गया। देशभर से कुल 30 मामले सामने आए, जिनमें सबसे अधिक 19 मामले खैबर-पख्तूनख्वा (केपी) से, नौ सिंध से, और एक-एक मामला पंजाब तथा गिलगित-बाल्टिस्तान से दर्ज किया गया। सबसे अधिक प्रभावित प्रांत खैबर-पख्तूनख्वा में उत्तर वज़ीरिस्तान, लक्की मरवत, टैंक, डेरा इस्माइल खान, लोअर कोहिस्तान, तोरघर और बन्नू से अधिकांश मामले सामने आए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दशकों से चल रहे सामूहिक टीकाकरण अभियानों के बावजूद पोलियो पाकिस्तान में अब भी फैल रहा है। इसका मुख्य कारण जनता में गहराई तक फैला अविश्वास और टीकाकरण के प्रति लगातार विरोध है। गलत सूचना, राजनीतिक हस्तक्षेप और सुरक्षा चुनौतियों के मेल ने पोलियो की बूंदों को विवाद का विषय बना दिया है, जिससे उन्मूलन प्रयास कमजोर पड़ गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, जनता के विश्वास में आई कमी पोलियो के अब भी स्थानिक बने रहने का प्रमुख कारण है। इसके साथ ही सुरक्षा खतरों ने भी स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

इसके अलावा, संचार और जनसंपर्क रणनीतियों की कमजोरी तथा पर्यावरणीय निगरानी की कमी के कारण भी समस्या बनी हुई है। इन खामियों की वजह से कई प्रांतों के सीवेज नमूनों में अब भी पोलियो वायरस की मौजूदगी पाई जा रही है।
 

Latest Replies

Forum statistics

Threads
11,007
Messages
11,044
Members
19
Latest member
Jessantict5434
Back
Top