नई दिल्ली, 3 फरवरी। बांग्लादेश में इस महीने होने वाले आम चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है। चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के बीच माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही मैदान में कई अन्य दल भी हों, लेकिन जीत की वास्तविक क्षमता इन्हीं दो पार्टियों के पास है।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के बाद अवामी लीग पर लगाए गए प्रतिबंध ने उसके समर्थकों को गहरे असमंजस में डाल दिया है। शुरुआत में अवामी लीग समर्थकों ने चुनाव बहिष्कार की घोषणा की थी, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं।
खुफिया सूत्रों के अनुसार, चुनाव प्रचार के दौरान जमात और बीएनपी से जुड़े उम्मीदवारों द्वारा लोगों को मतदान न करने पर “चिन्हित किए जाने” की धमकियां दी जा रही हैं। खासतौर पर अवामी लीग समर्थकों को डराया जा रहा है कि यदि वे मतदान के लिए नहीं निकले तो उन्हें अवामी समर्थक मानकर निशाना बनाया जा सकता है।
जमात-ए-इस्लामी ने खुद को पूरी तरह अवामी लीग विरोधी बताने का अभियान तेज कर दिया है। उसके उम्मीदवार खुले तौर पर यह दावा कर रहे हैं कि शेख हसीना की पार्टी का समर्थन करना “राष्ट्र-विरोधी” है। जमात ने ऐसे लोगों की पहचान के लिए टीमें भी बनाई हैं, जो मतदान के दिन घर से बाहर नहीं निकलते।
एक अधिकारी ने बताया कि मतदान से दूरी बनाने वालों को अवामी लीग समर्थक मानकर प्रताड़ित किए जाने की आशंका है। इसी डर के कारण अब कई लोग, जो पहले मतदान से दूर रहना चाहते थे, वोट डालने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
बीएनपी और जमात दोनों का दावा है कि शेख हसीना के शासनकाल में उनके कार्यकर्ताओं पर अत्याचार हुआ। जमात पर प्रतिबंध लगाया गया था और उसके कई सदस्यों को फांसी दी गई, जबकि बीएनपी प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया सहित कई नेताओं को जेल में डाला गया था। अधिकारियों का कहना है कि दोनों दल अब “पुराना हिसाब चुकता” करना चाहते हैं।
खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी ने कहा कि जमात और अन्य संगठनों द्वारा फैलाया गया भय अब असर दिखा रहा है। कई लोग खुलकर यह स्वीकार करने से भी डर रहे हैं कि वे अवामी लीग के समर्थक हैं।
सूत्रों के मुताबिक, मौजूदा हालात पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हैं। इस बार सिर्फ राजनीतिक तौर पर नहीं, बल्कि अवामी लीग के अस्तित्व को पूरी तरह खत्म करने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि अधिकारियों का यह भी कहना है कि पार्टी के नेता इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। अवामी लीग के कई नेता निर्वासन में हैं और वापसी की रणनीति बना रहे हैं।
हसीना सरकार के पतन के बाद हजारों पार्टी कार्यकर्ता बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गए थे। इनमें से कई इस समय कोलकाता में हैं और नियमित बैठकों के जरिए पार्टी की वापसी की योजना बना रहे हैं। वे लगातार शेख हसीना के संपर्क में भी हैं, जो इस समय नई दिल्ली में रह रही हैं।
पिछले कुछ हफ्तों से शेख हसीना बांग्लादेश और कोलकाता में मौजूद अपने पार्टी नेताओं से संपर्क बनाए हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अवामी लीग को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे जल्द और ठोस कदम उठाने होंगे। उनका आरोप है कि जमात और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार अवामी लीग को पूरी तरह खत्म करने पर आमादा है।
हालांकि चुनाव से पहले अवामी लीग ने अपने समर्थकों से मतदान बहिष्कार की अपील की थी, लेकिन बांग्लादेश पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि भय और प्रताड़ना के चलते बड़े पैमाने पर बहिष्कार की संभावना बेहद कम है।