चौरी चौरा: जब जन आक्रोश ने बदली आजादी के आंदोलन की राह, गांधीजी भी हुए मजबूर

चौरी चौरा दिवस: इतिहास की वो घटना, जिसने आजादी की लड़ाई की दिशा बदल दी


नई दिल्ली, 3 फरवरी। भारत के इतिहास में चार फरवरी की तारीख की गूंज आज भी उतनी ही तेज है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के पास उस वक्त स्थित एक छोटा-सा कस्बा, चौरी चौरा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्णायक और विवादास्पद अध्याय का साक्षी बना। यही वह जगह है, जहां 1922 में भड़की चिंगारी ने पूरे राष्ट्रीय आंदोलन की राह बदल दी।

हमारे देश के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी कुर्बानियां और घटनाएं हैं। इन घटनाओं में एक नाम चौरी चौरा कांड का भी है, जिसने न केवल ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाया, बल्कि आंदोलन की रणनीति पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए। यह घटना बताती है कि जब जनता का आक्रोश असहयोग की सीमाओं को लांघ गया, तो महात्मा गांधी जैसे नेतृत्व को भी कठिन निर्णय लेने पड़े।

दरअसल, 4 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम के तहत गोरखपुर जनपद में स्थित चौरी चौरा में एक बड़ा घटनाक्रम घटा। ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीतियों से आक्रोशित भीड़ ने वहां स्थित एक पुलिस चौकी पर हमला कर दिया। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस चौकी को आग के हवाले कर दिया गया। इस आगजनी में चौकी के भीतर छुपे 22 या 23 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मर गए। इतिहास में यह घटना चौरी चौरा कांड के नाम से दर्ज हो गई।

इस हिंसक घटना ने महात्मा गांधी को गहरे आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया। उनका स्पष्ट मानना था कि हिंसा के रास्ते पर चलकर आजादी हासिल नहीं की जा सकती। गांधीजी ने यह कहते हुए असहयोग आंदोलन वापस ले लिया कि हिंसा के माहौल में यह आंदोलन उपयुक्त नहीं रह गया है। गांधीजी के इस निर्णय को उस वक्त काफी आलोचना का सामना करना पड़ा। हालांकि, इतिहासकारों का मानना है कि चौरी चौरा कांड ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा और नई दशा दी। अहिंसा बनाम हिंसा की बहस यहीं से और अधिक तीखी हुई।

चौरी चौरा कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने सख्त कार्रवाई करते हुए बड़ी संख्या में लोगों पर मुकदमे चलाए। इस मुकदमे की पैरवी देश के महान शिक्षाविद और स्वतंत्रता सेनानी पंडित मदन मोहन मालवीय ने की। अभियुक्तों को बचा ले जाना उनकी एक बड़ी कानूनी और नैतिक सफलता मानी जाती है, जिसने ब्रिटिश न्याय व्यवस्था की कठोरता को चुनौती दी।

आज चौरी चौरा सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित स्मृति है, जो 1922 के उस घटनाक्रम को याद दिलाती है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा प्रभावित की। यहां शहीद स्मारक और संग्रहालय देशभक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल बना हुआ है। रेल मार्ग से पहुंचने के लिए गोरखपुर से देवरिया जाने वाली लगभग सभी ट्रेनें चौरी चौरा रेलवे स्टेशन पर रुकती हैं। गोरखपुर जंक्शन से चौरी चौरा की दूरी लगभग 24-25 किमी है, और कई ट्रेनें यहां रुकती हैं।

इसके अलावा, गोरखपुर हवाई अड्डे पर उतरकर टैक्सी या कैब से सीधे चौरी चौरा पहुंचा जा सकता है, जो करीब 30-40 किमी की दूरी है। गोरखपुर और देवरिया दोनों शहरों से नियमित बस सेवाएं भी चलती हैं, जिनमें से कई बसें चौरी चौरा तक या आसपास तक पहुंचाती हैं।
 

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