नई दिल्ली, 2 फरवरी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सांसद अभिषेक बनर्जी की अगुवाई में टीएमसी प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात की। इस दौरान टीएमसी की तरफ से पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर चर्चा की गई।
टीएमसी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर दी गई जानकारी के अनुसार, इस मुलाकात के दौरान टीएमसी ने चार मुद्दे उठाए। इसमें कहा गया कि 2002 की निर्वाचन सूची में शामिल वैध मतदाताओं को मामूली नाम के अंतर के आधार पर सुनवाई के लिए मनमाने तरीके से बुलाया जा रहा है, जबकि चुनाव आयोग ने इसकी गारंटी दी थी कि ऐसा नहीं होगा।
इसके साथ ही, माइक्रो-ऑब्जर्वर, जिनमें से कई भाजपा समर्थक हैं, को बंगाल में तैनात किया जा रहा है, जबकि उनके पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। ऐसा लग रहा है कि इसका उद्देश्य प्रक्रिया को प्रभावित करना है। भाजपा के सदस्यों ने वैध मतदाताओं को हटाने के लिए एक साथ फॉर्म 7 आवेदन जमा करने की कोशिश की, जो आयोग द्वारा अचानक नियम बदलने से संभव हुआ।
बैठक के दौरान कहा गया कि बंगाल और उसके लोग भेदभावपूर्ण और अनदेखी वाले व्यवहार का सामना कर रहे हैं। इससे अब तक 150 लोगों की जान गई है और महिलाओं, बुजुर्गों, बीमारों, प्रवासी मजदूरों और दैनिक वेतनभोगियों को भारी पीड़ा उठानी पड़ी है।
टीएमसी का कहना है कि हम उम्मीद कर रहे थे कि आयोग सहानुभूति दिखाएगा और तुरंत सुधारात्मक कदम उठाएगा, लेकिन आयोग ने अपनी गलतियों को स्वीकार करने की बजाय प्रतिनिधिमंडल की आवाज को दबाने की कोशिश की।
टीएमसी ने चुनाव आयोग से मांग की है कि तुरंत प्रभाव से उन सभी मतदाताओं को जारी किए गए “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” श्रेणी के नोटिस वापस लिए जाएं, जिनके नाम 2002 के निर्वाचन सूची में पहले से ही दर्ज हैं और जिन्होंने आवश्यक दस्तावेज जमा किए हैं। सुनिश्चित किया जाए कि तकनीकी या तुच्छ कारणों से कोई मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न हो। मामूली वर्तनी त्रुटियों, नाम में थोड़े अंतर, या आयु से संबंधित असंगतियों में छूट दी जाए। ऐसे सभी मामलों को मतदाताओं को बुलाए बिना बीएलओ/ईआरओ द्वारा सत्यापन के माध्यम से हल करने का निर्देश दिया जाए।
यह भी कहा गया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर द्वारा अर्ध-न्यायिक निर्णय प्रक्रिया में गैरकानूनी दखल बंद किया जाए। साथ ही यह स्पष्ट किया जाए कि केवल पश्चिम बंगाल में 8,000 से अधिक माइक्रो-ऑब्जर्वर तैनात करने का कोई वैधानिक आधार है या नहीं।