रांची, 2 फरवरी। झारखंड की राजधानी रांची स्थित ऐतिहासिक लोकभवन परिसर का उद्यान सोमवार से 8 फरवरी तक आम नागरिकों के लिए खोला गया है। पहले ही दिन बड़ी संख्या में लोग उद्यान का भ्रमण करने पहुंचे। इनमें स्कूली बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा रही।
सुसज्जित लॉन, रंग-बिरंगे फूलों और हरियाली से घिरे परिसर में लोग फोटो, वीडियो और सेल्फी लेते नजर आए।
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने स्वयं लोक भवन उद्यान का भ्रमण कर व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया और आम नागरिकों से सीधे संवाद कर उनके सुझाव भी प्राप्त किए। उन्होंने कहा कि लोक भवन उद्यान रांची की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का अहम हिस्सा है, जिसे जनता के लिए खोलना एक सुखद अनुभव है।
52 एकड़ में फैले लोकभवन के उद्यान में 400 किस्म के गुलाब, 20 हजार से ज्यादा मौसमी फूलों के पौधे और तरह-तरह के औषधीय एवं दुर्लभ पेड़ हैं। उद्यान में ब्रिटिशकालीन टैंक, कृत्रिम ऑक्टोपस, कृत्रिम पहाड़, झरने, दीवारों पर सोहराई पेंटिंग, एमआईजी 21 विमान और विशालकाय चरखा सहित झारखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़ी स्मृतियां लोगों को खूब आकर्षित करती हैं। इस वर्ष लोक भवन उद्यान की सबसे बड़ी खासियत ट्यूलिप फूल बने हैं।
उद्यान प्रभारी पर्यवेक्षक नीलेश रासकर के अनुसार, ट्यूलिप के साथ इस बार कैना लिली, मरक्यूरिस और रेननकुलस जैसे नए फूल भी पहली बार लगाए गए हैं। किचन गार्डेन में आइसबर्ग लेट्यूस, काले आलू, काली गाजर और विभिन्न मौसमी सब्जियों की खेती भी दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
झारखंड का लोकभवन (पूर्व में राजभवन) ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1930 में बनना शुरू हुआ था, तब इंग्लैंड में जॉर्ज पंचम का शासन था और झारखंड एकीकृत बिहार का हिस्सा था। रांची बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। 1931 में करीब सात लाख की लागत से ये बनकर तैयार हो गया।
इस भवन के आर्किटेक्ट सैडलो बलार्ड थे। यहां का उद्यान भी उसी वक्त स्थापित किया गया था, जिसे बाद में लगातार विकसित किया गया। राजभवन के उद्यान के कई हिस्से हैं। इनका नामकरण विभिन्न महापुरुषों और प्रख्यात विभूतियों के नाम पर किया गया है। आज यह उद्यान न केवल प्रशासनिक विरासत का प्रतीक है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता और ऐतिहासिक स्मृतियों के कारण रांची की पहचान बन चुका है।