बांग्लादेश: जमात-ए-इस्लामी ने उतारा हिंदू उम्मीदवार, पर रिपोर्ट ने खोली पोल - क्या यह सिर्फ समावेशिता का दिखावा?

बांग्लादेश: जमात-ए-इस्लामी की ‘समावेशी’ बनने की कोशिश अधूरी, रिपोर्ट में उठे सवाल


ढाका, 1 फरवरी। बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी ने खुद को सभी धर्मों को साथ लेकर चलने वाली पार्टी दिखाने की कोशिश के तहत खुलना-1 (डाकोप–बाटियाघाटा) सीट से अपने हिंदू प्रकोष्ठ के नेता कृष्ण नंदी को उम्मीदवार बनाया है। कृष्ण नंदी डुमुरिया उपजिला में पार्टी की हिंदू समिति के अध्यक्ष हैं।

हालांकि, एक रिपोर्ट के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी की यह पहल वास्तविक समावेशिता से काफी दूर है और पार्टी के संविधान में बड़े बदलाव के बिना यह प्रयास केवल दिखावटी ही माना जाएगा।

बांग्लादेश के प्रतिष्ठित अखबार द बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी ने 2008 में अपने संविधान में संशोधन किया था ताकि वह जनप्रतिनिधित्व आदेश (आरपीओ) में हुए बदलावों के अनुरूप खुद को पंजीकृत रख सके। इन नियमों के तहत राजनीतिक दलों के संविधान को बांग्लादेश के संविधान के अनुरूप होना जरूरी है और धार्मिक भेदभाव पर रोक है।

हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी के संविधान की प्रस्तावना, मूल आस्था और मार्गदर्शक सिद्धांत अब भी इतने सख्त इस्लामी हैं कि गैर-मुसलमानों के लिए पूर्ण सदस्यता लगभग असंभव हो जाती है।

द बिजनेस स्टैंडर्ड में शमीम ए. जाहेदी ने लिखा, “संविधान में बड़े और ठोस संशोधनों के बिना जमात-ए-इस्लामी का खुद को एक समावेशी राजनीतिक दल के रूप में पेश करने का प्रयास वास्तविक समावेशिता नहीं कहा जा सकता।”

पार्टी के संविधान के अनुसार, कोई भी बांग्लादेशी नागरिक या गैर-मुसलमान जमात-ए-इस्लामी से जुड़ सकता है, लेकिन उसे पूर्ण सदस्यता नहीं दी जाती। संविधान की धारा 11 में कहा गया है कि कोई भी गैर-मुसलमान नागरिक केवल ‘एसोसिएट सदस्य’ बन सकता है, बशर्ते वह पार्टी के राजनीतिक और आर्थिक कार्यक्रमों से सहमति जताए। इसका मतलब यह है कि कृष्ण नंदी और हाल के दिनों में पार्टी से जुड़े अन्य हिंदू नेता पूर्ण सदस्य नहीं हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पार्टी की ‘मूल आस्था’ धारा में विचारधारा को पूरी तरह इस्लामी रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें अल्लाह पर विश्वास, पैगंबर मोहम्मद को अंतिम पैगंबर मानना और कुरान और पैगंबर के जीवन को एकमात्र आदर्श और विचारधारा के रूप में स्वीकार करना अनिवार्य बताया गया है। ये शर्तें गैर-मुसलमानों के लिए स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकतीं।

संविधान की धारा 7 के तहत पूर्ण सदस्य बनने के लिए व्यक्ति को सभी फ़र्ज़ (अनिवार्य इस्लामी कर्तव्यों) और सुझाई गई धार्मिक गतिविधियों का पालन करना होता है, इस्लाम के विरुद्ध मानी जाने वाली कमाई और व्यवहार से बचना होता है, और उन संगठनों से दूरी बनानी होती है जिनकी नीतियां इस्लाम के खिलाफ हों। धारा 9 में सदस्य की जिम्मेदारियों को भी इस्लामी आचरण से जोड़ा गया है।

शमीम ए. जाहेदी के अनुसार, पार्टी सदस्य से अपेक्षा की जाती है कि वह शरिया की सीमाओं का पालन करे, अपने विश्वास और जीवनशैली को कुरान और सुन्नत के अनुसार ढाले, गैर-धार्मिक या इस्लाम से भटके लोगों से दूरी बनाए और केवल आस्था रखने वालों से मजबूत संबंध स्थापित करे।

रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि ये सभी शर्तें केवल वैचारिक नहीं, बल्कि धार्मिक आचरण पर आधारित हैं, जिससे गैर-मुसलमानों के लिए पूर्ण सदस्यता और पार्टी के नीति-निर्माण ढांचे में आगे बढ़ना असंभव हो जाता है। यह विरोधाभास जमात-ए-इस्लामी की तथाकथित समावेशिता को कमजोर करता है और इसे राजनीतिक अवसरवाद के रूप में उजागर करता है।
 

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